प्रज्ञा दया पवार की कविताएँ ::
मराठी से अनुवाद : सुनीता डागा

प्रज्ञा दया पवार

कभी नहीं मर सकती हैं

कभी नहीं मर सकती हैं
अलक्षित स्त्रियाँ
कविता लिखने वाली

लगा देगी दाँव पर
पेट में अटा हर वक़्त का उष्ण अँधियारा
लिखने के मायने
पूरी तरह से उघाड़ना
स्वयं को स्वयं के भीतर से ही
इसका रखते हुए भान
होती रहेंगी सदैव बे-भान

बदनामी की काली-नीली निशानियों को
लेकर चलेगी शान से इतराकर
हँसती चली जाएँगी
सुनसान उचाट-से तलघर में
सुनती रहेंगी अपनी ही फटती जाती आवाज़
दीवार से टकराकर
फिर-फिर उगती हुई

उनके खुले झंझावाती बालों से बहती रहेंगी
नखशिखांत कवयित्रियों की अफ़वाहें
ऊब जाएँगी संकेत-स्थानों से
सांकेतिक
जमुहाइयों को निगलते हुए
क्रूस से सीधे
उतरेंगी नीचे ज़मीन पर
फिर-फिर मिटाती रहेंगी
काग़ज़ पर
और नए सिरे से गढ़ेंगी
हिरकनी की प्रतिमा
पथरीले स्तन्य से
विरुद्ध अर्थ की

इस जादुई मुहल्ले में
दिखाई देगी उनकी प्रतिमाएँ
अम्लान
और
व्यस्त
गलाती हुई विष को
पीना पड़ता है जिसे सदैव
किसी न किसी की ख़ातिर।

चौथा कमरा

प्रकट होने लगते हैं
कई-कई रहस्य
जब जीना चाहते हो तुम
चौथे कमरे में

यह अथक
आवाजाही
चलती रहती है
पहले
दूसरे
तीसरे
और चौथे में
यहीं पर तो होता है
अस्ल आनंद
बावजूद इसके
सार्वकालिक सिसकी की आवाज
उठती है थरथराती हुई
दुःख के निढाल पेट से

विमुख होना पड़ता है तुम्हें
होना पड़ता है वंचित
कई बार यह भी लगने लगता है
अच्छा-भला था वही
सब्ज़ी-रोटी का कौर
उम्र भर की आदत में ढला
मौत की सीधी-सरल
कारण-मीमांसा
बीच में ही खींचती है तुम्हें अपनी ओर
और परिपाटी की पालकी में बैठकर
अमर होने की दोहद भी
बैचैन कर सकती हैं तुम्हें
बीच-बीच में

चौथा कमरा
नहीं खड़ा होता है इतनी सहजता से
नहीं अंदेसा ले सकते हैं
झिंझोड़ती हवा के साथ हिलते
तलस्पर्शी विराट अँधेरे का
सुघड़-सपाट दीवार के सहारे
मिठाई बाँटते चलते हुए
नहीं लिखी जा सकती है
कोई विराणी1आर्त्तता से भरकर लिखा हुआ एक प्रकार का गेय-काव्य जिसमें विरहिणी की व्याकुल वेदना समाहित होती है। लपटों से घिरी चली आती

हटना पड़ता है वचन से
मुकरना पड़ता है संकल्प से
लिया हुआ अनुष्ठान
छोड़ना भी पड़ता है
बेहद कठोरता के साथ!

बिखेरकर रख देना पड़ता है
संज्ञा की समेटी हुई तह को
फोड़ लेनी पड़ती है आँखें
और नज़रों को रोक कर
दृढ़ता से
निहारना पड़ता है
विद्रोह की प्रतिमाओं को
दायरे से निकलकर
उड़ान भरती हुईं!

ईंटों पर ईंटों को ढोकर
इस सुरंगनुमा भट्टी में
कब से रखा हुआ है सेंकने
सुनती हो री!
तौली नहीं जा सकती है
रसीदी टिकट पर
सामने खड़ी
इस पूरे जीवन की गुत्थी।

मैंने नहीं चुना इस जग को

मैंने नहीं चुना था इस जग को
नहीं चुना इस देह को
नहीं चुना मैंने
अपना चेहरा
हत्याकांड में क्षत-विक्षत हुआ

कब किया मैंने?
चुनाव अपनी भाषा का
निर्ममता से नष्ट की जा चुकी…
एक पूरा वाक्य
जिसके भीतर रहते थे
मेरे कई-कई उच्चारण
होंठों की आड़ में दबे-दबे उत्कट…

कब चुने मैंने?
इच्छा के विपरीत
लादे गए संभोग
और लथपथ पड़े गर्भाशय
मन को चिरकाल तक पीड़ा पहुँचाने वाले…
यह रास्ता
निरंतर एक लसलसा रक्त फैलाता हुआ
कब चुना था मैंने?

यह देह है
हज़ारों टुकड़ों-टुकड़ों में सिली हुई
जिस पर है
अनगिनत घाव
वर्तमान को उधेड़-धुनकर
सपनों की धुनकी कपास कातने वाले

नहीं चुना मैंने यह जग
नहीं चुनी यह देह
फिर भी
बनाना है मुझे इसे
जीने के लायक़
ख़ूबसूरत
और शिष्ट
जिस पर होगी मनुष्यता की सारी निशानियाँ
जो लटकेगी मेरे सीने पर शान से
मंगलसूत्र की जगह।

चिर व्याकुल अकेलेपन के होर्डिंग्स पर

‘आठ मार्च ही क्यूँ
अब हर दिन ही
हमारा है’
करें क्या अंत इस तरह से इस कविता का
वैश्वीकरण की इस घेराबंदी से
और गूँथे बीच-बीच में पंक्तियों को
ज़ालिम उपहास की
विद्रोही-शिद्रोही
लिखें ब्योरे हिंसा के
भय के
मारे जाने के
जिस तरह से लिखती आ रही हैं हम
पता नहीं किस तारीख़ से
डोमेस्टिक वायलेंस से लेकर
वर्ल्ड कप की तरह
सार्वजानिक रोमांच बलात्कार का।

सिर्फ़ तारीख़ें ही तो बदली हैं
चीख़ती हुई अँधेरे में
हाथ-पाँव पटकती हुई
दिन के उजाले में
वेदना से बिलबिलाती।

इस चिर व्याकुल अकेलेपन के होर्डिंग्ज़ पर
खड़ी होकर हम फैला रही हैं
हमारी उन्मुक्त
हाड़-मांस की प्रतिमाएँ
सवाल यह नहीं है कि
किसने चखें सर्वप्रथम
मोह के फूल
सारे भौतिक संदर्भों को छाँटकर
उस धूर्त लिओनार्डो ने बना दिया हमें
रहस्यमय आदि आदि
आसान ही तो होता है बिल्कुल
एक तो तब्दील कर दीजिए मोनालिसा में
या फिर बाज़ार की उन्मुक्त हवा में
पाशविक रक्त से सने
हमारे अंतर्वस्त्रों को छोड़ दीजिए
निर्ममता से सूखने के लिए
हम फोड़े जा रही हैं
अभी तक उसी गुफा को
नुकीले धारदार हथियारों से
तुम गूँजने दो अपनी आवाज़ को
आख़िरी बार हाँफती
इस ग्लोबल रण-दुदुंभी में

रहा मुद्दा आठ मार्च का
जिंदा धड़कने का
गुफा को फोड़ने का
पुनः पुनः!

अशांत

धधकता रहता है हर वक़्त
तुममें मुझमें उसमें
एक ज्वलनशील टापू
अशांत
कैसी-कैसी वजहों का
इतिहास वर्तमान से
टकराता हुआ
विस्फोटक हो सकता है वह
ख़तरनाक भी
आसानी से पहुँच सकता है अब
उत्कलन के चरम बिंदु तक
आँखें फूटती हैं
कान फटते हैं
बन जाता है मस्तिष्क का
फूल एक छिन्न-विछिन्न-सी चीज़
फिसलती हुई जा गिरती है
पैर की चिट्टी उँगली
किसी रक्तिम भूमि पर

वाक़ई किसलिए कहते हैं हम?
मैं दाभोलकर
मैं पानसरे
मैं कलबुर्गी
तपाक से निशाना साध सकती है अब
बंदूक़ से निकली सीधी एक गोली
कहीं से भी
नष्ट हो चुकी चिर स्थाई शांति पर
पत्थर उछालकर
मेरी तुम्हारी उसकी ओर से।

स्थलांतरण

यहाँ पर आते वक़्त
साथ में कुछ किताबें थीं
कुछ बर्तन-बासन
ज़रूरत का सामान
बोरे में भरे हुए असहनीय अँधेरे के साथ

आत्यंतिक ध्वस्तता में भी
जीवटता से भीख माँगता
एक युवक
हर दिन दिखाई देता है मुझे
घर के पास के सिग्नल पर
उसकी तरह नहीं कटा है
किसी दुर्घटना में
मेरा अंग आधा
न मैंने अपना कुछ गँवाया
भूकंप
बाढ़ या अकाल के चपेट में
न ही लोकल के बम-धमाके में
उड़े हैं मेरे चिथड़े
न मुझ पर हुआ सामूहिक बलात्कार
बावजूद एक दलित स्त्री होने के!

फिर भी मेरी पूरी देह में
अपार दुःख है भरा हुआ
उसके आधे अंग की ही तरह
अंतर केवल इतना ही
भीख के लिए आगे फैले उसके हाथों से
बह रही है एक
ज़िंदा धुकधुकी
आत्महत्या से मुझे रोकती हुई।

चले गए सभी संबोधन हवा के साथ उड़कर

गए चले गए सभी संबोधन हवा के साथ उड़कर
नहीं देती है अब थपेड़े
कोई भी लहर
कितना भी उलट-पुलट कर घुमाइए
फिर भी ब्योरों की देह पर
एक निहायत ही साधारण गेंदा भी
नहीं खिलता
किसी अस्थायी तरोताज़ा दिन पर
यह इतना ही शेष है
एकाध तस्वीर
जिसमें दिखाई देती हूँ मैं
किसी बाल-विवाहिता-सी मासूम
कोई प्रसंग
यादों के झूमर से चिपक कर बैठा हुआ
गंध कोई
बेहद निजी
हँसती हूँ मैं आँख के कोने से
पोंछती हूँ जमा हुआ पानी
नहीं पता था मुझे
इतना नम-मुलायम-सा
कुछ बचा हुआ है मुझमें
अब आ जाओ तुम
डुबा दो मुझे सागर के गहरे तल में
बनने दो अन्न
इन अजस्त्र महाकाय जीवों का
मेरे अंग-अंग को नोचते हुए
दफ़्न कर दो मुझे
निविड़ अरण्य के
किसी प्राचीन सरसराते वृक्ष के नीचे
बेहद उदास
खिन्न हो चुका है सब
कितना घिरा हुआ है यह अँधेरा
भीतर-बाहर
पता नहीं
कहाँ अटकी हुई पड़ी है
कलेजे को फोड़कर आने वाली
तुम्हारे मेरे बीच की अ-कविता।

प्रज्ञा दया पवार (जन्म : 1966) सुप्रसिद्ध मराठी कवयित्री-कथाकार और संपादक हैं। ‘अंत:स्थ’, ‘उत्कट जीवघेण्या धगीवर’, ‘मी भिडवू पाहतेय समग्राशी डोळा’, ‘आरपार लयीत प्राणांतक’ और ‘दृश्यांचा ढोबळ समुद्र’ उनके प्रमुख कविता-संग्रह हैं। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है। सुनीता डागा मराठी-हिंदी लेखिका-अनुवादक हैं। उन्होंने समकालीन मराठी स्त्री कविता पर एकाग्र ‘सदानीरा’ के 22वें अंक के लिए मराठी की 18 प्रमुख कवयित्रियों की कविताओं को हिंदी में एक जिल्द में संकलित और अनूदित किया है। यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 22वें अंक में पूर्व-प्रकाशित।

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