कविताएँ ::
सूर्यस्नात त्रिपाठी

सूर्यस्नात त्रिपाठी

खिड़की

खिड़की की रौशनी में
बर्फ़ के टुकड़ों जैसे दीखते हैं
धूल के कण…

कमरे में, उत्तर की ओर
सो रही है शीत ऋतु
तुम्हारी यादों की चादर तले
छुप जाना चाहता हूँ मैं!

दहकते अंगार जड़ी एक रज़ाई है—
ये यादें तुम्हारी!
मेरा शरीर समाता नहीं जिसमें,
मेरे पाँव फैले हुए हैं—
अंतरिक्ष में!

अपनी दृष्टि की क़तार से
मैं अपने अवयवों को काट रहा हूँ…
जो उस चादर से बाहर झाँक रहे हैं
जैसे एक हठी शिशु के पैर हों।

मेरा शरीर लेकिन अब भी बड़ा है,
और तुम्हारी यादों की यह चादर छोटी!
सर्दी मुझे निगल रही है
जैसे कोई संक्रमण।

खिड़की के सीने पर एक छिद्र है,
मानो शरत् आकाश में अर्द्धसूर्य
मैं सूर्य के प्रकाश को आखों से पी रहा हूँ,
इस सर्दी को अपने रक्तकोषों में
उबाल रहा हूँ,
तुम्हे फिर से जी रहा हूँ।

अभी-अभी एक जादू हुआ,
और चट्टान से बर्फ़ का क़ालीन
ग़ायब हो गया…
अब यहाँ धूल ही धूल है!

प्रेम-कणिकाएँ

गणित का एक सूत्र कहता है
कि अभी इस समय यहाँ तुम्हारे पास
मेरे होने की संभावना
पचहत्तर दशमलव तीन एक प्रतिशत है।

और ग्यारह प्रतिशत संभावना है
कि मैं अभी यरुशलम के किसी
गिरिजाघर में हूँ।

सात प्रतिशत संभावना इस बात की भी है
कि मैं अभी एक जामुन के पेड़ से उल्टा लटका हूँ—
अपने गाँव में
और नन्हे चमगादड़ों को लोरी सुना रहा हूँ,
जिनकी माँ खाना ढूँढ़ने गई है।

तीन दशमलव सात छह प्रतिशत संभावना के साथ
मैं एक हैंगिंग पुल के ऊपर हूँ,
जो दो अतिउच्च पर्वत-शिखरों को
एक दूसरे से जोड़ता है। पुल अभी टूटने को है,
मेरे पाँव काँप रहे हैं,
दोनो हाथों को ऊपर उठा लिया है मैंने,
ईश्वर अभी तक प्रकट नहीं हुए हैं।

और अभी मैं मर चुका हूँ,
एक प्रतिशत संभावना के साथ।

मैं और भी अनेक स्थानों पर अनेक रूप में हूँ अभी,
अनेक रंगों में, एक ही समय पर!

किंतु अभी यहाँ तुम्हारे पास
मेरी उपस्थिति ही सबसे ज़्यादा संभावित है।
जबकि मैं जानता हूँ कि गणित में
अल्प की उपेक्षा नहीं होती।

यूँ होने न होने का गणित बड़ा जटिल है, है न?
ठीक तुम्हारी मेघ-रंग आँखों की तरह…
धूप में, छाँव में—हरदम स्नात
और तुम्हारी हँसी की तरह—
सुख में, दुख में… समान रहस्यों से
आच्छादित।

परंतु यह गणित कोई आश्चर्य की बात तो नहीं है।
तुम भी तो अनेक चिंताओं में बँटी हुई हो अभी।
यहीं हो और नहीं भी,
मेरे सीने पर सर रख कर सोती हुईं निश्चिंत,
और तुम्हारे कान किसी के आने की आहट तलाश रहे हैं।
भय छुपाए हुए हो तुम, लाज के आँचल तले…
प्रेम-निवेदन कर रही हो, राग मधुवंती गा रही हो,
और फिर बालकनी से उखाड़ फेंक रही हो क्यारियों को,
हवा में ज़हर भर रही हो! अभी तुम पंछी बन उड़ रही हो
खुले आकाश में, और अभी तुम अनुसोचनाओं से
आच्छादित!

बहुधा विभक्त हो तुम अभी,
मैंने तो केवल तुम्हारे यहाँ होने की
एक अतिभौतिक संभावना को
सहेज रखा है—हथेली पर।
उसी को घड़ी-घड़ी चूम रहा हूँ मैं।

तुम और मैं, केवल दो प्रेम-कणिकाएँ हैं,
जिनका निकट आना और दूर हो जाना,
हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता-सिद्धांत की तरह,
एक पहेली है।

और, शायद, यह भी सत्य है
कि हम दोनों कभी भी, कहीं भी
एक साथ नहीं हैं।
पाउली के अपवर्जन नियम के अधीन
दो फ़र्मिऑन की तरह,
हम दोनों, एक दूसरे के सान्निध्य से,
सदा सुरक्षित हैं।

यह जो ‘मैं’ है, यही गौण है

‘‘मैं पंख बनाना चाहता हूँ अब।
चाहे किसी की भी हो उड़ान,
मैं उपहार में देना चाहता हूँ आकाश,
अनंत असीम आकाश,
नील अनील आकाश!

और अपने कंधों पर बिठाकर,
किसी नन्ही चिड़िया को,
छोड़ आना चाहता हूँ गगन में!
देह को डाली बनाकर,
मैं उसके नाख़ूनों को चूमना चाहता हूँ।

जा, उड़ जा रे पंछी,
लाँघ जा आकाश दर आकाश!
पहुँच की सारी सीमाओं को लाँघ, अपहुँच की
सरहदों को चूम तू। अदृश्य लकीरों को
नोच ले पंजों से।

ला, मैं पहना दूँ ये पंख,
उड़ जा, बस उड़ने ही के लिए केवल!
ला, मैं बिछा दूँ आकाश, एक जादुई क़ालीन की तरह,
इस आकाश को लाँघ तू निराकाश शून्य में उतर जा।
ला, मैं तोड़ देता हूँ ज़ंजीरें,
मुक्त हो जा तू, और भुला दे हर उस राह हो
जो लौट आती है इधर।

ला, मैं बिछा दूँ आकाश,
पहना दूँ पंख,
तोड़ दूँ ज़ंजीरें…’’

यह जो ‘मैं’ है, यही गौण है,
बस इतना याद रहे, ओ रे पंछी!
उड़ना ही लक्ष्य है तेरा,
केवल और केवल उड़ना।

उड़ जा, जो मन करे उड़ने को…
याद रहे, तेरी इच्छा ही तेरा आकाश है।
और तेरी इच्छा से बंदी है तू।

और यह जो ‘मैं’ है, यही गौण है।

ख़बर

यह तो कोई ख़बर नहीं है,
कि तुम्हारी बालकनी में गुलाब का एक फूल
खिला है। ख़बर तो तब बनती,
जब तुम्हारे गुलाब के पेड़ पे
हरसिंगार के फूल खिलते!

या फिर मेरी आँखों के झरोखों से
कोई सूरज उगता और
तुम्हारी रातों को निगल जाता।

पर ऐसा नहीं होता।
गुलाब ही खिलते हैं हमेशा तुम्हारी बालकनी में,
और तुम ख़ुद ही कि आँखों से जागती हो
हर सुबह—हरियाली की तरह!

और मैं दिन भर देखता रहता हूँ टी.वी. पर
अनेक अपराधों का नाट्यरूप,
सीखता रहता हूँ तमाम तरीक़े
तुम्हें मारने के लिए,
जब तुम अफ़वाहें बुनने में गुम होती हो।

फिर इन्हीं अफ़वाहों को बड़े सलीक़े से
इधर-उधर बिखेर देती हो तुम,
इस शहर की नसों में…
वे पुरानी शराब की तरह घुलती हैं।

फिर नशे में झूमता-लड़खड़ाता हुआ
इक अख़बार आता है मेरी दहलीज़ पर,
तुम्हारी बचकानी हरकतों की ख़बर सुनाता है।
मैं ठहाके मार कर हँसता हूँ और देखता हूँ
कि तुम भी हँस रही हो साथ-साथ—
आईने में।

कभी-कभी तुम्हारा निकट आना बड़ा ही
असामान्य लगता है। मेरे होंठों पर
मलती रहती हो ख़ुद को, जैसे
एक पुराने रिकॉर्डर में उलझी हुई रील हो तुम,
मेरे होंठों पर धीरे-धीरे नील-परत जमने लगती है,
और मैं ख़बर बन जाता हूँ।

कभी तुम सड़क के बीचोबीच मिलती हो।
आँख मारती हो तुम, और गाड़ियाँ रुक जाती हैं…
मेरे भी क़दम एक्सिलरेटर को ढील देते हैं,
और अपेक्षा में रहते हैं कि कब तुम इशारा करो,
और ब्रेक दबाई जाए। और तभी,
काला चश्मा चढ़ा लेती हो तुम आँखों पर,
धूप के बहाने इशारे छुपाती हो
तुम।

देखा जाए तो यह भी कोई ख़बर नहीं है।
ख़बर तो तब बनती
जब तुम
चश्मा उतार देतीं केवल मेरे लिए,
धूप को आँखें दिखातीं,
और तुम्हारे होंठों के ठीक पास,
मेरी गाड़ी का ब्रेक फेल हो जाता।

मेरी दुनिया

मेरी दुनिया में,
रोज़ सुबह एक सूरज मुस्कुराता है,
भोर का स्वप्न हरसिंगार के फूलों-सा महकता है,
बारिश अंबर से धरती पर उतरती है,
और पेड़ धरती से आकाश की ओर जाते हैं।
शाम ढले यहाँ टिमटिमाते हैं—
सितारों के फूल,
अँधेरा होकर भी नहीं होता,
और हवा, हवा को कोई छू नहीं पाता।

यहाँ चाँद सफ़ेद है,
गुलाब लाल, पत्ते हरे-हरे।
पानी का कोई रंग नहीं,
इंद्रधनुष में सारे रंग सजते हैं,
और मेरी रातें,
मेरी रातें श्याम रंग हैं यहाँ।

जानती हो,
यहाँ बिल्ली आँखें मूँद कर दूध पीती है,
और घोड़े खड़े-खड़े सो जाते हैं,
कुत्तों को भूत दिखाई देते हैं,
साँप आँखों से सुनते हैं,
कोयल का बच्चा कौए के घर पलता है,
और मोर, मोर बारिश आने से नाचने लगते हैं।

और हाँ, यहाँ,
आँखें भी बोल सकती हैं।

बहुत सुंदर हैं तितलियाँ इधर,
उनसे भी सुंदर हैं सीपियों में छुपे मोती,
और भी सुंदर है लहरों से भरा समंदर,
लेकिन इन सबसे सुंदर है बारिश।

तुम्हारी दुनिया भी क्या ऐसी ही है?

मेण्डल

मेण्डल ने कुछ मटर के बीज बोए थे ज़मीन में!
जब पहला विश्वयुद्ध होने को था,
आइंस्टीन का जन्म अभी नहीं हुआ था,
पराधीन भारत में मुक्तिगीत के पहले छंद लिखे जा रहे थे,
और पश्चिम में कोई कुछ भी नहीं देख रहा था अपने सिवा,
तब मेण्डल देख रहे थे रंग,
मटर के गोल और सपाट बीजों का।
लोग पागल कहते थे उनको,
और वह महायोग में थे।

यह पागलपन असाधारण है, हर कोई
यूँ ग़ौर से, इतने वर्षों तक
देख नहीं पाता मटर के बीज को।
हर कोई ढूँढ़ नहीं पाता उन राहों को,
जिनके होने का आभास मात्र भी नहीं मिलता
इतिहास और पुराणों में। हर कोई,
भीड़ से अलग नहीं हो पाता।

एक सच तो यह भी है कि अपने समय की स्थितावस्था
और इतिहास के शिलालेखों को
भले लोग प्रश्नांकित नहीं करते ।
प्रश्न तो पागल ही करता है,
जवाबों से भय नहीं लगता उसको…

और पूरा इतिहास उठा कर देखो,
दृष्टांतों की कमी नहीं है,
समाज हमेशा ही कुछ लोगों को
पागल कहता आया है।
जो समाज के समझ के परे हो,
उसका यूँ ही प्रतिरोध होता रहा है हमेशा ।

लैब से लौटते हुए, मैं कुछ बीजाणुओं को
छोड़ आया हूँ आज, काँच के एक पेट्री डिश में,
अल्प मीठे पानी में। जबकि यह परीक्षण
मेरे सिलेबस में है ही नहीं। होशियार लोग कल कहीं
मुझको भी पागल न कहने लगें।

सूर्यस्नात त्रिपाठी (जन्म : 1991) ओड़िया कवि हैं। वर्ष 2017 में साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं। वह फ़िलहाल आईआईटी (हैदराबाद) के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट में पोस्ट डॉक्टरल रिसर्चर हैं। यहाँ प्रस्तुत कविताएँ मूलतः ओड़िया में लिखी गई कविताओं का कवि-कृत हिंदी अनुसृजन हैं। सूर्यस्नात से [email protected] पर बात की जा सकती है।

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