अन्ना कामीएन्सका की कविताएं ::
अनुवाद और प्रस्तुति : उपासना झा

अन्ना कामीएन्सका (12 अप्रैल 1920 – 10 मई 1986) पोलिश मूल की कवयित्री, लेखिका और अनुवादक हैं. उन्होंने बच्चों के लिए भी खूब लिखा है. इनकी कविताओं के पंद्रह संग्रह, पढ़ने से उपजे विचारों और स्वयं से पूछे गए प्रश्नों की दो नोटबुक और बाइबिल पर तीन नोटबुक प्रकाशित हैं. अन्ना कामीएन्सका ने हिब्रू, लैटिन, फ्रेंच और कई स्लावोनिक भाषाओं (रशियन, चेक, स्लोवाक, मैकेडोनियन, बुलगैरियन, पोलिश, क्रोएशियन आदि) से विशद अनुवाद भी किए हैं.

कैंसर से पति की अचानक मृत्यु के बाद अन्ना कामीएन्सका इसाई हो गईं, तब उनकी उम्र 47 वर्ष थी. उनकी कविताओं में अकेलेपन की पीड़ा, अनिश्चतता का भय, तार्किक मस्तिष्क का धार्मिकता से संघर्ष उभरकर आता है. प्रेम से उपजी पीड़ाओं की बात करते हुए भी उनकी कविताओं में एक तरह की चुप्पी और छिपी हुई कृतज्ञता है.

हिंदी में करीब पांच बरस पहले अन्ना कामीएन्सका की कविताएं, जीवनी और नोटबुक मशहूर अनुवादक अशोक पांडे के मार्फत ‘पहल’ और उनके ब्लॉग ‘कबाड़खाना’ पर प्रकाशित हो चुकी हैं. यहां प्रस्तुत कविताएं ‘पोएट्री फाउंडेशन’, ‘इमेज जर्नल्स’ और ‘दी वैल्यू ऑफ स्पैरोज’ पर उपलब्ध अन्ना कामीएन्सका की कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद पर आधृत हैं.

अन्ना कामीएन्सका

छोटी चीजें

यह आमतौर पर आकार लेना शुरू करता है
एक शब्द से
स्वयं को खोलता है एक मुस्कान में
कभी आंखों पर चढ़े चश्मे की नीली चमक में
एक कुचले हुए डेजी1एक प्रकार का फूल. में
रास्ते पर अचानक पड़ी रौशनी में
गाजर के हिलते हुए पत्तों में
पार्सले के एक झोंप2धनिया-मेथी सरीखे हरे पत्तों का गुच्छा. में
यह आता है बॉलकनी में सूखते कपड़ों से
आटा सने हुए हाथों से
बंद पलकों से टपक जाता है
जैसे लोगों की अपनी दीवारों से बनी हुई कैद
जैसे परिदृश्यों के चेहरे
यह तब होता है जब आप ब्रेड के करते हैं टुकड़े
जब आप उड़ेलते हैं कप में थोड़ी-सी चाय
यह खरीदारी के झोले में रखे झाड़ू से आता है
नए आलू छीलने से
सूई चुभ जाने से आए एक बूंद खून से
बच्चे की जांघिया सिलते समय
या पति को दफनाते समय पहनाई जाने वाली शर्ट में बटन टांकते हुए
यह बहुत परिश्रम से बिना देखभाल के
शाम की गहरी थकान से
एक पोंछ दिए गए आंसू से
बीच में नींद आ जाने के कारण भंग-प्रार्थना से

यह बड़ी चीजों से नहीं आता
यह आता है नन्हीं चीजों से
जो बढ़कर हो जाता है विशाल
ऐसे जैसे कोई रच रहा हो सृष्टि
जैसे बनाती है स्वालो3गौरैया जैसी एक चिड़िया. अपना घोंसला
क्षणों के गुच्छों से

एक प्रार्थना जो सुनी जाएगी

ईश्वर मुझे सहने दो असीम पीड़ा
और तब मरूं

मुझे चलने दो चुप्पियों के पार
और पीछे कुछ न छोडूं भय भी नहीं

चलने दो दुनिया को अनवरत
चूमने दो सागर को तट जैसा पहले होता रहा है

रहने दो घास को हरा
ताकि छिप सके मेढक उसमें

ताकि कोई छिपा सके अपना चेहरा इसमें
और सुबक उठे प्रेम के आधिक्य से
उगने दो दिन को चमकदार
जैसे कहीं कोई दर्द न हो

और रहने दो मेरी कविता को खिड़की के कांच जैसा साफ
जिसमें आकर एक भंवरा टकरा सके…

मां और मैं

बहुत जल्दी मैं अपनी मां की उम्र की हो जाऊंगी
शायद मैं भी पीड़ा सहते हुए हो जाऊं उस-सी कड़वी
तब शायद हम बात करने लायक हो सकेंगे आखिरकार
औरत से औरत बात करती हुई
मैं नहीं पूछूंगी उससे मूर्खतापूर्ण सवाल
इसलिए नहीं कि मैं बहुत जानती हूं
इसलिए कि कुछ प्रश्नों के उत्तर नहीं होते
और हम और बहस नहीं करेंगे
ईश्वर या पोलैंड के बारे में
सच्ची समझ
हमेशा चुप रहने में है

‘देखो’, कहती है मां

‘देखो’, कहती है मां मेरे सपने में
‘देखो’ एक चिड़िया बादलों तक जा रही है
इसके बारे में क्यों नहीं लिखती हो तुम,
कितना भारी है ये, कितना आसान?
‘और यहां मेज पर— रोटी की गंध
बर्तनों की आवाज
तुम्हें कोई जरूरत नहीं है फिर से मेरे बारे में बात करने की
मैं नहीं हूं अब वहां जहां मैं लेटी हुई हूं
मैं गुजर चुकी हूं
मैं गल चुकी हूं
बस अब बहुत हुआ :
शुभरात्रि!’

इसलिए मैं लिखती हूं यह कविता
चिड़ियों के बारे में,
रोटी के बारे में… मां, मां.

कृतज्ञता

एक तूफान ने मेरे चेहरे पर इंद्रधनुष फेंका
ताकि मैं चाह सकूं बारिश में गिरना
कि चूम सकूं उस बूढ़ी औरत के हाथों को
जिसे मैंने अपनी सीट दे दी
दे सकूं हर किसी को धन्यवाद इस बात के लिए कि वे हैं
कभी-कभी मन होता है मुस्कुराऊं
उन नए पत्तों के प्रति आभारी होऊं
जो खिलना चाहते थे धूप में
उन बच्चों के प्रति
जो इस दुनिया में अब भी आना चाहते हैं
उन बूढ़े लोगों के प्रति
जो साहस से सहते रहे अंत तक
मैं कृतज्ञता से भरी हुई थी
जैसे रविवार की दान-पेटी
मैंने मृत्यु को लगा लिया होता गले से
अगर वह पास से गुजरती

कृतज्ञता है हर तरफ बिखरा हुआ बावरा प्रेम

***

उपासना झा हिंदी की एक दृष्टिसंपन्न कवयित्री और अनुवादक हैं. अपनी सक्रियता और अध्यवसाय से अक्सर हैरत में डालती रहती हैं. कहानियां भी लिखती हैं. उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है.

1 Comment

  1. manisha फ़रवरी 5, 2018 at 8:41 पूर्वाह्न

    maa aur main bus yahi meri pasandeeda

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