डॉ. वनिता की कविताएँ ::
पंजाबी से अनुवाद : सुदर्शन शर्मा

डॉ. वनिता

मेरी जंग

मेरी जंग आदमी के साथ नहीं
उसके माथे में बैठे फुफकारते सर्प के साथ है
सर्प के डंक के साथ है

मेरी जंग सागर के साथ नहीं
सागर में बनते भँवर संग है
जो मासूम जहाज़ों को बादबानों सहित डुबो देता है

मेरी जंग हाथी के साथ नहीं
हाथी की आँखों में मचलते काम संग है
जो गड्ढे में पड़ी काग़ज़ की हथिनी को देखकर भी मचल उठता है

मेरी जान!
मेरी जंग तेरे साथ तो कभी भी नहीं थी
सिर्फ़ तेरे मन में बैठे पुरखे की धारणा के अहम संग है मेरी जंग।

मैं शकुंतला नहीं

धर्म-विवाह का आधार
अगर मुद्रिकाएँ ही हैं
तब हे दुष्यंत!
मैं शकुंतला नहीं
जिसे तुम भूल जाओ
और अपनी याद दिलाने के लिए
मुद्रिका का सहारा लेना पड़े जिसे अपना निज
अपने श्वास, प्राण विस्मृत हो जाएँ
तो वस्तुओं का वास्ता…?! उफ़्फ़! कैसी तौहीन है?

यदि मुद्रिका से ही पहचानना है
तुम्हें मुझे
तब अच्छा ही है
कि तुम मुझे भूले ही रहो
मैं जनूँगी भरत
और भरत को जनने के लिए
न ही तो मैं विषण्ण होकर
मारीच ऋषि के पास पहुँचूँगी
न ही पिता कण्व के पास

मुझे तो तरस आता है
दुर्वासा ऋषि पर भी
काश! उसने स्मृतियों के रंगों का आनंद लिया होता
पर उसे स्मृतियों से कैसा प्रेम?
उसे तो अपनी भिक्षा की भूख
वर एवं श्राप के लोभ और अहंकार ही पर्याप्त है

किंतु हे दुर्वासा!
मैं तुम नहीं जो वर दूँगी या श्राप
हे पिता कण्व!
यदि (तुम्हारा) द्वार तज दिया तो वापस पाँव न धरूँगी
न ही मारीच के पास जाऊँगी

किंतु हे दुष्यंत!
यह आस तो बिल्कुल भी मत रखना
कि मुद्रिका को अपनी गवाह बना मैं
तुम्हें अपनी सुगंधियों और लाचारियों का वास्ता दूँगी

पर मैं भरत जनूँगी
जिसके लिए मछली के उदर में से मुद्रिका ढूँढ़ कर
उसके पिता को तलाशने के स्थान पर
मछलियों का निवास-गृह
समुद्र पिता ‘पानी’ दूँगी
माँ ‘धरती’ दूँगी।

हवा के सर इल्ज़ाम है

हवा के सर इल्ज़ाम है—
हवा को टिककर बैठने की आदत नहीं है
हवा के सर इल्ज़ाम है
वह चढ़ते सूरज का ललाट चूमती है
तपते सूरज में तप्त होती है
ढलते सूरज में घुलमिल जाती है

हवा के सर इल्जाम है—
वह अमावस के चाँद का सत्कार करती है
पूर्णिमा के चाँद को प्यार करती है
यही नहीं बल्कि
अर्धचंद्र की किनारी संग भी
करती है अठखेलियाँ

इतना ही नहीं कुछ और भी इल्ज़ाम हैं हवा के सर
अपराधी है हवा
वह सूरज-चाँद ही नहीं
सितारों संग भी प्रफुल्लित होती रहती है
सितारों संग खेलते हुए
बनती है कभी आग़ोश उनके लिए
और कभी ढाँप लेती है उनको अपने आलिंगन में
रात को उनके अंक में खेलती है
दिन में छुपा लेती है उन्हें अपने ही अंक में

हवा के सर इल्ज़ाम यह भी है—
हवा आग को छूती है और
प्रज्वलित कर देती है उसे
छुए जो वनतृणों को तो वे बतियाते हैं उसके संग
हरी-हरी
गुलाबी-गुलाबी
जामुनी-जमुनी
लाल-उनाबी बातें

हवा को वे कहते हैं
अक्खड़
मैली
बदचलन
एक घर में नहीं बैठती टिक कर
विचरती
फूलती
चढ़ती है
श्वास-श्वास
घर-घर
गली-गली
नगर-डगर
अबुल-फ़ज़ल
हवा के सर इल्ज़ाम यह भी
वह भी
और भी

उनकी ओर से इल्ज़ाम है
हवा के सर
जो
चाहते हैं हवा को
मुट्ठियों में भींचना।

क्या मालूम शायद

जब वादी में नमी हो
आँखें सजल हों
तो उतावले मत होना मेरी जान
ऐसे जीर्ण समय में
बादल बस रवाना ही हुआ होता है
घटाएँ चढ़ने को होती हैं
फिर बूँदें बरसती हैं
ऐसे गर्जन-तर्जन के बाद
मेह बरस ही जाता है
पर हो सकता है बादल गुज़र ही जाए
या बरसे तो सैलाब आ जाए

जो होंगे दिलों में अफ़साने तो
कोई पंछी पर फड़फड़ाएगा
तो समझ लेना कुसुमन होने को है
कोयल कूकने वाली है
मोर नाचने वाला है
और नए रंग खिल पड़ेंगे
पर क्या मालूम नए रंगों को खिलते देख
आँधियाँ बलवा करने लगें
और नव-कुसुम धरती पर आ गिरें

जब चहुँ ओर ख़ामोशी जैसी चुप हो
फूल-पत्ती बुत हो
घरों में अँधेर घुप हो
तो याद रखना शायद दीपक जल पड़े
या कोई किरण निकल पड़ी हो
पर क्या मालूम
मारक हवाएँ बहने लगें।

कोई और नहीं

जब वह सहम जाती थी हर बात से
काँपता था हर वाक्य उसके मुख से बाहर निकलने से
तो माँ समझाती उसे बार-बार
देती उपमाएँ शेर के हौसले की

कहती—
कहाँ से पी आई हो तुम सियारी का दूध
मैंने तो तुम्हें पिलाया था सिंहनी का दूध
तो कैसे बन गईं तुम सियारी जैसी
कैसे गुज़रोगी इन कँटीली राहों पर से
कैसे पार करोगी आग का दरिया

सुन कर माँ की नसीहतें एक दिन कर ही लिया उसने साहस अपने रूपांतरण का
अभी तो उसने खाल ही पहनी थी
पंजे ही लगाए थे सिंहनी के
सबसे पहले जो घबराई, डरी, काँपी
कोई और नहीं
उसकी माँ ही थी।

संस्कारों की सलाख़ें

एक बहुत बड़ा घर
ज्यों जेल के अंदर एक कोठरी
कोठरी में मैं
और मेरी ‘मैं’ के भीतर मेरे बाग़ी ख़यालात

घर के बाहर मुझे
दरख़्तों के पत्तों की आवाज़ सुनाई पड़ती
नभ में उड़ते परिंदों की क़तारें देख मेरे पंख स्पंदित होते
नभ में चमकते चाँद
तारों के झुरमुट
और आज़ाद हवाओं की सरसराहट को जब मैं हुंकारा भरती
या नज़र भर देखती तो
मेरा कंठहार मुझे फाँसी के फंदे-सा लगता

मेरे पंखों में फड़कती उड़ान
कुतर दी जाती संस्कारों की कतरनी लेकर
और उन्हें लगता
अब यह अपनी चोंच से
फल या हरी मिर्चें नहीं कुतरेगी
और न ही आएगा
किसी परवाज़ का काशनी ख़याल इसे

उन्हें भ्रम है

मेरे लिए मेरे अस्तित्व के संकट से उबरने की ख़ातिर
बहुत ज़रूरी है
घर के संस्कारों की सलाख़ों को तोड़ना
मेरे पास एक इरादा है कि
अब मुझे अपने बोलों को लेकर
रगों में सोए पड़े सुरों के साथ मिलकर
हवाओं में उड़ना और गरजना है
अपनी चोंच से
एक किरमजी सपना
अपनी हथेली पर उठाना है।

डॉ. वनिता समादृत पंजाबी कवयित्री और आलोचक हैं। वह साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित हैं। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है। सुदर्शन शर्मा हिंदी कवयित्री और अनुवादक हैं। ‘तीसरी कविता की अनुमति नहीं’ शीर्षक से उनकी कविताओं की एक किताब प्रकाशित है। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है।

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