साक़ी फ़ारुक़ी की नज़्में ::
लिप्यंतरण : अनुराधा शर्मा

urdu poet Saqi Farooqi
साक़ी फ़ारुक़ी

वारिस

मैं सच्चा हूँ, नहीं नहीं, पर झूट और झूट से नफ़रत है
और किताबों में लिक्खा है नफ़रत बड़ी इ’बादत है
ये मेरी नफ़रत का वारिस मेरा नाम चलाएगा
तेरी अंगिया महक चली है कच्चे दूध की ख़ुशबू से
मेरी नफ़रत अमर बन गई इस बच्चे के जादू से

तआ’क़ुब

मैं रोता हूँ
ऐ निस्याँ की शह्र-ए-पनाह
मैं रोता हूँ
मेरे दुख बेदार हैं आवाज़ों की तरह
एक अनोखी आग रगों में बहती है
नींद मिरे क़ब्ज़े में नहीं राज़ों की तरह
मैं रोता हूँ
मैं रातों का भेद हूँ गहरा और अथाह
देर से रूह की तारीक़ी में बैठा हूँ
मेरे तआ’क़ुब में है एक गुनाह
मैं रोता हूँ
ऐ मेरे तारीक़ गुनाह
मैं रोता हूँ

तितली

वो पागल थी
पागलपन में
उसके पर काँटों से उलझ कर लौट गए
अब अपने ज़ख़्मी पैरों पर
इक पीले पत्ते के नीचे
बैठी है और सोचती है
सोचती है और रोती है

ये तो मिरी मोहब्बत है
ये तो मिरी मोहब्बत है

क़ैदी

ये बेलिए के नन्हे पौधे
कलियों से भरे फूलों से लदे
ये क़ैद हैं अब तक मिट्टी में
मैं मिट्टी से आज़ाद हुआ
और आज़ादी पर रोता हूँ

नया रोग

हम समंदर में भी प्यासे थे बहुत
आग देखी आब में
देर तक बहते रहे जिस्मों के शह्र
रूह के सैलाब में
देर तक उठती रही लज़्ज़त की लह्र
रंग के गिर्दाब में
और हम दोनों अकेले थे बहुत

***

साक़ी फ़ारुक़ी (21 दिसंबर 1936-19 जनवरी 2018) उर्दू के आधुनिक शाइरों में से एक हैं। यहाँ प्रस्तुत उनकी नज़्में लिप्यंतरण के लिए उनकी किताब ‘सुर्ख़ गुलाब और बद्र-ए-मुनीर’ से चुनी गई हैं। अनुराधा शर्मा उर्दू कवयित्री और अनुवादक हैं। वह दिल्ली में रहती हैं। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है। पाठ में मुश्किल लग रहे शब्दों के मानी जानने के लिए यहाँ देखें : शब्दकोश। यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 21वें अंक में पूर्व-प्रकाशित।

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