कविता ::
मनोज कुमार पांडेय

manoj kumar pandey hindi writer
मनोज कुमार पांडेय

रुलाई
अमितोष नागपाल के लिए

बारिश न आए तो किससे सवाल किया जाए
किससे सवाल किया जाए कि नल में पानी नहीं आया
किससे सवाल किया जाए कि इतनी गर्मी क्यों पड़ रही है
किससे सवाल किया जाए कि रोज़गार और पढ़ाई के बीच सही-सही संबंध क्या है
किससे सवाल करूँ कि मेरे शहर की टॉकीज़ में अच्छी फ़िल्में क्यों नहीं लगतीं
क्यों नहीं होते नाटक
क्यों नहीं हैं किताबों की दुकानें कहीं सड़क पर भी
किससे सवाल करूँ कि ये सवाल राजनीतिक सवाल तो नहीं हैं न
राजनीतिक सवाल बस महामहिम पूछ सकते हैं अपने पूर्ववर्तियों से

हम निजी बातें करेंगे राष्ट्र की जय बोलते हुए
जन गण मन पर खड़े होंगे और उसके बाद देखेंगे सौ करोड़ी फ़िल्में
फ़िल्मों में खलनायक कम होते जाएँगे बढ़ते जाएँगे समाज में
हम निजी बातें करते हुए उन खलनायकों को वोट देंगे
फिर खलनायक वही करेंगे जो वे फ़िल्मों में करते हैं
और भी भयावह यथार्थवादी बर्बरता के साथ

हम धीरे-धीरे खुसुर-फुसुर करते हुए ज़ोर-से उनकी जय बोलेंगे
भीतर चलता रहेगा एकालाप
जारी रहेगी दिलासा-भरी प्रार्थना
जो गति बनी दूर किसी की उससे सदा बचे रहेंगे हम
पड़ोसी के साथ जो हुआ वह उसकी जाति या धर्म की वजह से था
हमारी जाति और धर्म को नहीं है कोई ख़तरा
बाक़ी होगा भी तो भली करेंगे ईश्वर या फिर वे
पृथ्वी का निष्कंटक राज्य जिन्हें सौंपा है ईश्वर ने
ईश्वर में बहुत शक्ति है हमने देखा ही है बार-बार फ़िल्मों में
सत्यनारायन भगवान की कथा से भी यही साबित होता है

***

एक उम्मीद पर ज़िंदा हूँ मैं उसकी पैरोडी रचते हुए
इसलिए नहीं कि सचमुच सोचता हूँ कि वैसा होगा
इसलिए कि वह मुझे नशे में रखती है
मैं जिस शहर में रहता हूँ वहाँ शराब ब्लैक में मिलती है
शराब मुझे पसंद है पर ब्लैक नहीं है मेरे पास

ब्लैक इतनी भी नहीं है कि एक छतरी खरीद लूँ उससे
कि जब उम्मीद की रोशनी जला रही हो तब तान लूँ सर पर

तब मैं दोस्तों को याद करता हूँ और रोता हूँ
तब मैं अपनी पत्नी और बच्चों को अपने ऊपर तान लेता हूँ
तब मैं पिता को याद करता हूँ जिन्होंने अथाह धैर्य से थामे रखा
सूखती और सिकुड़ती हुई उम्मीद को
मैं उनकी आख़िरी रुलाई भूलने की कोशिश करता हूँ और
उम्मीद को ठंड से अकड़े हुए साँप की तरह गले में लपेट लेता हूँ

इतने लोगों के दम पर हँसता हूँ कि बेफ़िक्र दिखता हूँ
इतना कि उस दिन तो एक प्रोफ़ेसर तक ज्ञान लेने आ गए
कि आप इतने निश्चिंत कैसे रह लेते हैं ख़ुश और मुस्कुराते हुए
उन्हें लगता था मुझे तो कपड़े उतार घूमना चाहिए नंगा
पहने हुए बेचारगी और उदासी का फ़रेब कि वे दया दिखाएँ मुझ पर
कभी-कभार ख़ुद से उधार ऑफ़र करें बिना ब्याज के
और अपनी छवि को आईने में निहारें सुबह-शाम

नहीं मैं इसलिए भी ख़ुश दिखता हूँ कि
किसी की आत्ममुग्धता का आईना बनने से बचा रह सकूँ

***

रोज़ पैदल ही निकलता हूँ ऑफ़िस
हर एक क़दम के साथ जूतों का वज़न बढ़ता जाता है
लंबी दौड़ के धावक अपने पैरों में वज़न बाँधते हैं तैयारी के वक़्त
मैं किस दौड़ की तैयारी करता हूँ रोज़ ऑफ़िस जाते हुए

रास्ते में अक्सर मिलता है एक बिन माँगा सुझाव
मोटर साइकिल ख़रीद ही लीजिए अब पैदल चलते अच्छे नहीं लगते
पैदल चाल बर्दाश्त नहीं होती अब लोगों से कुछ से तो इतनी कि
बग़ल से गुज़रते हुए हाथ अपने आप चला जाता है एक्सीलेटर पर
उन लोगों के बारे में ज्यादा नहीं सोचता
परिवार के बारे में सोचता हूँ
मेरी पत्नी मेरे बच्चे जो ख़ून में ऑक्सीजन की तरह दौड़ते हैं
माँ भाई बहन और बहुत सारे दोस्त जो मेरे ख़ून में रंग भरते हैं
उन सब की चिंताओं में बहुत जगह घेरता हूँ पैदल चलता हुआ
मोटर साइकिल होती तो सट्ट से निकल जाता
कब तक बचूँगा एक दिन मैं भी सट्ट से निकल जाऊँगा

***

कभी सोचा नहीं था कि हिंदी जानने का मतलब होगा
दिन भर प्रूफ़ पढ़ना वाहियात शोध-आलेखों का
कि हिंदी किसी राजभाषा अधिकारी की गाय होगी
जिसे वह मरते दम तक दुहता ही जाएगा
और एक दिन संपादक एवं आलोचक कहाएगा

कभी सोचा नहीं था कि एक कवि को हिंदी में लिखने पर आएगी ग्लानि
और लोग उसकी ग्लानि को सच कर दिखाएँगे
भाई बर्बर में बदल जाएँगे जाति बाहर प्रेम करने पर किसी लड़की के
माँ अपनी ही बेटी की लिंचिंग का उत्सव मनाएगी
जो लिंचिंग के विरोध में होंगे उन सबकी लिंचिंग की जाएगी

कभी सोचा नहीं था कि यह सब होगा
क्यों नहीं सोचा था भला
क्यों नहीं सोचा
क्यों नहीं
क्यों

एक नौकरी मेरे लिए कहीं दूर सुरक्षित है कई सालों से
वह मुझे मिलती नहीं तो किसी और को भी नहीं मिलती
बहुत ही ख़ूबसूरत है मेरा वह कार्यालय
वहाँ सब देवभाषा बोलते हैं नवीन

***

अ को मत छापो वह रूस में पैदा हुआ था
ब को मत छापो वह अलीगढ़ का है
स प्रयागराज का है पर है तो मुसलमान
द स्त्री अधिकारों की बात करती है इसलिए मत छापो
दलित लेखकों को मत छापो
मार्क्सवादियों को मत छापो
समाजवादियों को भी मत छापो अगर वे सरकार में नहीं हैं

तुम्हें कुछ करना ही नहीं है
चार लेख छापो मेरे भेजे हुए
फिर दो छाप सकते हो अपने मित्रों के भी
अच्छे से समझ लो संपादकीय नीति
नौकरी बची रही तो विद्वान भी कहाओगे

बुद्धि मोटी है तुम्हारी सो उदाहरण देता हूँ
मान लो पाँच कवियों की कविताएँ तुम्हारी डेस्क पर हैं
उन्हें जाँचो और अच्छे से ख़राब के क्रम में नंबर दो
और अब इस क्रम को पलट दो
जो पाँचवें नंबर का कवि है उसी को छापना है हमें
पहले चार को ससम्मान लौटाओ कविताएँ
इस विनम्र अनुरोध के साथ कि दुबारा न भेजें
विनम्रता हमारी असली शक्ल छुपा लेती है अपने भीतर
तुम्हें विनम्रता से काम लेना है और जो मैं कहूँ करते जाना है

***

बहुत सारी किताबें हैं जिन्हें पढ़ते हैं चाँदी के कीड़े
मैं उन्हें ख़रीद कर घर लाता हूँ उनके लिए
कई बार वे मित्र भी भेज देते हैं जो लिखते हैं उन्हें
कमरे बदलते हुए एक कमरे से दूसरे कमरे तक ढोता हूँ
पड़ोसी पूछते हैं कि ये किताबें भला किस काम की हैं
क्या आपने पढ़ ली हैं सारी किताबें
रास्ते में अचरज करते हैं लोग
कई बार मैं भी लोगों के अचरज में शामिल होता हूँ
किताबों से चटनी तक नहीं बनती कि उसे रोटी के साथ खाया जा सके
किताबों से चादर तक नहीं बनती कि मेहमानों के आने पर बिछाया जा सके

जल्दी ही उनके अचरज से किनारा करता हूँ और कहता हूँ
कि किताबें कई बार मनुष्यों की बराबरी पर खड़ी हो जाती हैं
और हाथ बढ़ाकर पोंछती हैं आँसू
कि वे बच्चों की तरह ठुनकती हैं
ज़िद करती हैं
रूठती हैं और प्रेम करती हैं
कि वे हमारे ही बारे में हैं
वे हमारी ही बातें करती हैं
किताबों से ही रिसता है वह पानी
जिससे बुझाई जा सकती है पड़ोसी के घर की आग
कि किताबें आईना भी होती हैं समय का
जिसमें सब कुछ देखा जा सकता है—साफ़-साफ़
पता नहीं मेरे बयान में ख़राबी या कहीं और
वे किताबों को डर से और मुझे हैरत से देखते हैं
कुछ बुदबुदाते हैं चुपचाप उठते हैं और चले जाते हैं

***

दस दिनों से पानी नहीं आया है
नहाए हुए पूरे चार दिन
कल दिन भर पसीना निचोड़ा
उससे साफ़ किए कुछ कपड़े
जो नमक निकला उसे पड़ोसी को उधार दिया
पड़ोसी ने उससे नमकीन बनाई और मेहमानों को परोस दिया
मेहमानों में मैं भी था
पानी अभी तक नहीं आया है
पता नहीं कभी आएगा भी या नहीं

ज़िंदगी अब सड़ कर खट्टी हो गई है
बहुत तीखी बास आती है
उम्मीद का तिनका भी फ़रेब में गुम है
एक झूठी आस आती है
जिसके ख़याल में मरा हूँ ज़माने से
वह मेरे कब पास आती है
दरिया किसी अकाल से आता है शायद
बह कर सूखी घास आती है

पैरों के तलवे जलते हैं तो उन्हें सुनाता हूँ उदास नज़्में
भीग जाते हैं उदासी में
उदासी ठंडक देती है उन्हें
वे चुपचाप ज़मीन पर टिक जाते हैं—
उसे महसूस करते हुए
उनका महसूसना मेरे चेहरे पर पढ़ सकते हैं आप
राज़ की बात यह भी कि चेहरे से ज्यादा सच्ची हैं हथेलियाँ
मेरी उँगलियाँ मेरे चेहरे से ज़्यादा भावुक हैं
ज़्यादा कर्मठ और कठोर भी

***

एक स्त्री के स्वास्थ्य के बारे में सोचता हुआ बीमार होता हूँ
यह स्त्री मेरी माँ है बहन है पत्नी है दोस्त है बेटी है
यह स्त्री अपने दुख छुपाती है—सात तालों के भीतर
एक दिन मैं ये ताले तोड़ता हूँ—पुरुषोचित ज़बरदस्ती के साथ
और जानता हूँ कि मैंने कोई कम दुख नहीं दिए उसे
बल्कि यह मेरे ही दिए दुख थे
जिन्हें सबसे ज़्यादा छुपाने की ज़रूरत थी
मैं रोता हूँ पर उस स्त्री को दुख देना बंद नहीं करता
वह रोती है पर मुझे सुख देना बंद नहीं करती

उसके दुखों और मेरे सुखों के बीच का फासला कम होने का नाम नहीं लेता
साथ रहते हुए भी इतिहास अलग है हमारा
अलग हैं रुलाई और हँसी और अलग हैं क़िस्से और गीत
एक ही दृश्य के अलग प्रतिबिंब क्यों बनते हैं हमारी आँखों में
वह अपनी ही बेड़ियों में उलझी है कभी तोड़ती है कभी जोड़ती है

जब वह यह सब कर रही होती है
मैं क्या कर रहा होता हूँ
जिन बेड़ियों को वह नहीं तोड़ पाती उन्हें तोड़ता जाता हूँ
जिन बेड़ियों को वह तोड़ देती है उन्हें जोड़ता जाता हूँ

***

लोग सिगरेट से नफ़रत करते हुए जलाते हैं अगरबत्तियाँ
उनकी धूपबत्ती के रसायन ईश्वर को भी हैं पसंद
सिगरेट में भरा होता है तंबाकू उससे कैंसर होता है
दिए की बाती में जलता हुआ तेल चुपड़ उठता है किसी ग़रीब की रोटी में

सोचता हूँ किसी दिन कान में लटका लूँ हरी मिर्च और पीला नीबू
ज़ोर-ज़ोर से पढ़ूँ राशिफल सभी अख़बारों का
दिखा डालूँ हाथ दुनिया भर के तोतों और पंडितों और चिड़ियों को
जाकर लोट जाऊँ किसी बाबा ख़ान बंगाली के चरणों में

कुछ न हो ख़ुश तो हो जाएँगे घर के लोग पड़ोसियों सहित
जो मानते हैं कि दुनिया में सारा अनाचार बस हम जैसों की वजह से है
धर्म की राह पर चलने से विकसित होता है देश और समाज
धर्म किस राह पर चलता है यह तो पूछो ही मत

हम तर्क करते हैं तो तर्क से ज़्यादा फ़रेब करते हैं
सोचते हैं कि सामने वाला समझता नहीं यह बात
यह सोचते हैं और ख़ुद फ़रेब में रहते हैं
उन्हें ही दोस्त बनाते हैं जो फ़रेब करते हैं

उम्मीद एक फ़रेब है जो लोगों को लड़ना सिखाती है
वे लड़ते हैं और उनकी लड़ाई को बेचते हैं बीच के दलाल
लड़ो पर अपनी उम्मीद की गठरी किसी और को मत सौंपो
तुम्हें सबसे पहले अपने रहनुमाओं से लड़ना होगा

***

वे कहते हैं कि चुप रहो तो क्या करोगे इसके सिवा कि अपनी ज़बान बंद रखो पर इतना पक्का है कि वे चुप्पी की पागल कर देने वाली बेचैनी और चुप्पी के भीतर पैदा होने वाले उस भयानक शोर के बारे में कुछ भी नहीं जानते जो भीतर हहराता रहता है तो क्या तुम उन्हें इसके बारे में बताओगे या गूँगे हो जाओगे?

बोलता तो क्या बोलता और तुम्हें भला समझ में कितना आता कि जब साँस लेता तब बोलता देखता तुम्हें और दुनिया को और बोलता ही रहता

हवा आकर सहलाती रहती और मैं बोलता ही जाता और सूरज डूबता जाता मैं बोलता जाता और सूरज निकलता जाता मैं बोलता जाता… बातें कब ख़त्म होनी थीं मेरे भीतर की… सो मैं चुप ही रहा

किसी नाटक की रिहर्सल जैसा है सब कुछ जो न जाने कब खेला जाना है जिसका संवाद बदल दिया जाता है रोज़

***

रुलाई ने स्मृतियों को सँजोया भुलाया भी उसी ने बहुत कुछ
रुलाई ने मेरी आँखों को रखा साफ़-शफ़्फ़ाफ़
रुलाई ने बार बार वह लेंस बनाए
जिनमें प्रियजनों को देखा और प्यार किया
रुलाई ने ही बोलना सिखाया और चुप रहना भी
रुलाई ने ही लड़ना सिखाया और सहना भी
रुलाई ने उदास किया उसी ने हँसाया भी मुझे
रुलाई के बीच अक्सर क्रोध आया बाद में करुणा
करुणा के बीच फिर आई रुलाई बाद में क्रोध भी

रुलाई ने किया बहुतों से दूर बहुतों के पास भी वही लाई
जिस हाल में हूँ वहाँ सब मर्ज़ों की एक दवा है रुलाई

***

बाबा सूरदास की पंक्ति गूँजती है भीतर :
यह लै अपनी लकुटि कमरिया बहुतहिं नाच नचायो 
इस पंक्ति का सरकारी भाषा में अनुवाद करता हूँ
और ऊपर वालों को दे आता हूँ

इसके बाद हँसी है ज़हर झरता है जिसमें से
इसके बाद हँसी है जिसमें से झाँकती है उदासी
बीते हुए साल हैं प्रेम और झगडे हैं
किताबों की निर्मम छँटाई है ट्रांसपोर्ट है
एक छोटा-सा ट्रक है जिसका मैं क्लीनर हूँ

दूर कहीं एक दोस्त दिखाई देता है
दूर कहीं एक राह दिखाई देती है
दूर कहीं एक शहर दिखाई देता है

धीरे-धीरे चल पड़ता हूँ उसी तरफ़…

मनोज कुमार पांडेय (जन्म : 1977) हिंदी के सुपरिचित कथाकार हैं। उन्होंने इस सदी में हिंदी के लिए कुछ यादगार कहानियाँ संभव की हैं। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित उनकी नवीनतम कथा-कृति ‘बदलता हुआ देश’ इन दिनों दृश्य और पाठ में है। वह फ़िलहाल इलाहाबाद में रह रहे हैं। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है।

3 Comments

  1. Prof. KV UNNIKRISHNAN फ़रवरी 22, 2020 at 3:33 अपराह्न

    Congratulations. Keep it up.

    Reply
  2. राकेश रंजन अप्रैल 16, 2020 at 6:46 अपराह्न

    बेहतरीन कविताएँ!

    Reply
  3. आशुतोष अप्रैल 19, 2020 at 12:04 अपराह्न

    अच्छी कविताएँ हैं। धीरे-धीरे कथा की तरह कविता में भी बात बनने लगी है। बधाई।

    Reply

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