देवीशंकर अवस्थी के कुछ उद्धरण ::

hindi Critic Devishankar Awasthi
देवीशंकर अवस्थी

अनुभूति की अभिव्यक्ति ही कला का रूप धारण करती है।

कला का मूल उत्स आनंद है।

कला न सुनीतिमूलक है और न दुर्नीतिमूलक।

वास्तविक कला कभी अशिव नहीं होती।

कला की आत्मा है सौंदर्यानुभूति।

कला मनुष्यत्व का चरम उत्कर्ष है।

कला-सृष्टि जीवन की सार्थकता है। जीवन से उसे अलग देखना अपराध है।

समकालीनता-बोध से रहित आलोचना को आलोचना नहीं कहा जा सकता—शोध, पांडित्य या कुछ और भले ही कह दिया जाए।

जो चिरंतन है, वही ग्राह्य है।

शाश्वत सत्य का समावेश ही काव्य और कला को स्थायित्व प्रदान करता है।

वास्तव में श्रेष्ठ साहित्य की रचना परंपरा के भीतर युग के यथार्थ को समेट लेती है।

आलोचना का प्राथमिक दायित्व नवलेखन के प्रति ही है।

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देवीशंकर अवस्थी (1930–1966) हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक हैं। यहाँ प्रस्तुत उद्धरण ‘देवीशंकर अवस्थी : संकलित निबंध’ (संपादक : मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, नेशनल बुक ट्रस्ट, पहला संस्करण : 2008) शीर्षक पुस्तक से चुने गए हैं।

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