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आवाज़ को आवाज़ न थी

डायरी और तस्वीरें :: पारुल पुखराज आवाज़ को आवाज़ न थी एक कहीं भी पहुँचो लगता है यहीं तो थे बरसों से। पीछे की हुई यात्रा नदारद हो जाती है। स्टेशन, ट्रेन, निरंतर बदलते लैंडस्केप सब अनायास ही कहीं विलुप्त हो जाते हैं या फिर किसी और ही कालखंड का हिस्सा प्रतीत होने लगते हैं। समय का कुछ भान नहीं रहता, कितना बीत गया। एक…

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