रोबेर्तो ख्वार्रोस की कविताएँ ::
अँग्रेज़ी से अनुवाद और प्रस्तुति : मोनिका कुमार

रोबेर्तो ख्वार्रोस │ तस्वीर सौजन्य : zenda

रोबेर्तो ख्वार्रोस (5 अक्टूबर 1925–31 मार्च 1995) अर्जेंटीना के विलक्षण कवि हैं। उनका जन्म अर्जेंटीना की राजधानी बुइनोस इरीस के पास कोरोनल डोरेगो नाम के क़स्बे में हुआ। अर्जेंटीना और फ़्रांस में तालीम लेने के बाद वह लाइब्रेरी और इन्फ़ॉर्मेशन साइंस के विशेषज्ञ के रूप में काम करते रहे। डॉक्यूमेंट्री टर्मिनोलॉजी के विशेषज्ञ होने के नाते वह लैटिन अमेरिकन असोसिएशन ऑव स्कूल्ज़ ऑव लाइब्रेरी साइंस के उपाध्यक्ष भी रहे। अपने जीवन-काल में ख्वार्रोस ने तेरह कविता संग्रह प्रकाशित करवाए। उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी लॉरा ने उनका अधूरा रह गया चौदहवाँ कविता-संग्रह पूरा करके वर्ष 1997 में उसे प्रकाशित किया। उनके पंद्रहवें संग्रह में लॉरा ने उनकी अभी तक अप्रकाशित कविताओं को एकत्रित करके 2002 में फ़्रेंच और स्पैनिश में द्विभाषीय संग्रह प्रकाशित किया। कविता के अलावा ख्वार्रोस की तीन गद्य पुस्तकें भी प्रकाशित हैं।

ख्वार्रोस ने अपनी कविताओं के शीर्षक नहीं लिखे और अपनी समग्र कविता को उन्होंने केवल क्रमांक से व्यवस्थित करके ‘वर्टिकल पोइट्री’ के नाम से प्रकाशित किया। ख्वार्रोस की समग्र कविता फ़्रेंच में अनूदित हुई। इसके अलावा उनकी कुछ कविताएँ जर्मन, इतालवी, पुर्तगाली, यूनानी, डैनिश, डच, रोमीनियन, हिंदी, अरबी और अँग्रेज़ी में भी अनूदित हुई हैं।

गए दिनों ‘कविता कोश’ पर वंशी माहेश्वरी के संपादन में पिपरिया (मध्य प्रदेश) से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘तनाव’ (अंक-11, नवंबर-1981) में अनुवाद-शृंखला के अंतर्गत रोबर्तो ख्वार्रोस की कविताओं के मूल स्पैनिश से हिंदी अनुवाद का चयन पढ़ने का अवसर मिला। प्रेमलता वर्मा द्वारा में किए इस अनुवाद-कार्य को आज सैंतीस वर्ष बाद याद करना सुखद है। संभवतः ख्वार्रोस का यह अनुवाद उनकी कविताओं के हिंदी अनुवाद के सिलसिले की पहली कड़ी है। ऐसा सोचना प्रीतिकर है कि हम केवल हिंदी-साहित्य-लेखन की ही नहीं, बल्कि विश्व-कविता के हिंदी अनुवाद की विशद और विराट परंपरा से भी जुड़े हुए हैं।

विलियम स्टानली मर्विन और मेरी क्रो, रोबर्तो ख्वार्रोस के दो प्रसिद्ध अँग्रेज़ी अनुवादक हैं, जिन्होंने ख्वार्रोस की कविता के अनुवाद पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किए। यह प्रस्तुति मेरी क्रो द्वारा संपन्न ‘वर्टिकल पोइट्री : लास्ट पोएम्ज़’ (वाईट पाईन प्रेस, न्यूयॉर्क, 2011) के स्पैनिश से अँग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित है। इस प्रस्तुति में मेरी क्रो के मूल अनुवाद-संग्रह में सम्मिलित सैंतीस कविताओं में से छत्तीस कविताओं को शामिल किया गया है, क्योंकि मूल संग्रह की एक कविता का अर्थ और अभिप्राय मुझे समझ नहीं आया।

मेरी क्रो अमेरिका की सुपरिचित कवियत्री और अनुवादक हैं। उनके दो कविता-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। ख्वार्रोस की कविता पर उन्होंने दो किताबें और अन्य कवियों समेत अनुवाद की पाँच किताबें प्रकाशित की हैं।

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भंगिमाओं की स्वतंत्र भाषा देखने में सोचा-समझा संयोग लगती है

रोबेर्तो ख्वार्रोस की कविता ‘भंगिमा’ का सुंदर व्याख्यान है। उनकी कविताओं के मनुष्य की पहचान ब्रह्मांड में उसका किसी विशेष काल और खंड में स्थित होना नहीं; बल्कि उसकी पहचान उसकी विशिष्ट भंगिमा है, जो यथार्थ से प्रभावित होकर भी उससे स्वतंत्र रहती है और समय के विशेष बिंदु में घटित होकर भी कालातीत होती है। ख्वार्रोस की कविता में समकालीनता का अर्थ है, बंद कमरे में बैठे मनुष्य और सुनसान सड़क पर खड़े मनुष्य की भंगिमा का जुड़कर एक हो जाना और उनके जुड़ने से स्थगित अलविदा का ‘पवित्र अलविदा’ बन जाना। ख्वार्रोस कहते हैं :

‘एक भंगिमा प्रेम जगाती है’

‘प्रेम उत्तरोत्तर और भंगिमाएँ जगाता है’

‘और कुछ और भी जो हमेशा सतह के नीचे रहता है’

ख्वार्रोस सतह के नीचे रहने वाले तत्त्व को कभी नहीं भूलते। ख्वार्रोस उस तीर को नहीं भूलते जो तीर आता है और ‘ब्रह्मांड को बींध देता है’, लेकिन वह सिर्फ़ तीर के इतिहास, स्वभाव या प्रयोजन पर अपना ध्यान एकाग्र नहीं करते बल्कि तीर में निहित ‘ज़रूरी बात’ को पढ़ते हैं, ‘इस तीर का अचूक और अज्ञात गुण’ हमें अपने अज्ञात होने का स्मरण कराता है, ताकि हम भी अपने आरंभ और अंत को भूलकर ‘सम्यक’ को जान सकें। विपश्यना ध्यान विधि जैसी ख्वार्रोस की दृष्टि स्मरण कराती है कि ‘हमने भी जल को धोखा दिया है’ क्योंकि जल की ‘स्पर्शनीय पारदर्शिता’ को समझे बिना हम जल को नहीं जान सकते, ‘हमने अभी यह तक नहीं जाना कि पानी की पारदर्शिता कैसे ग्रहण करें’ क्योंकि ‘पारदर्शिता को समझने का अर्थ है, अदृश्य को समझने की शुरुआत करना।’ ख्वार्रोस की कविता इस अदृश्य को समझने का अद्भुत प्रयास है जिसे किसी यांत्रिक बौद्धिक चेष्टा या केवल निश्चयात्मक बुद्धि से विमर्श में नहीं लाया जा सकता, बल्कि सतत द्वंदात्मक विवेक से प्रकाश में लाया जा सकता है, इस अदृश्य को वह प्रकाश में ला सकता है जो इस बात के प्रति सजग है कि ‘हर इबारत और हर लफ़्ज़, दिन और रात के समय और स्थिति के अनुसार बदल जाते हैं’ और जो जानता है कि ‘सबसे सुंदर दिन में अँधेरे पक्ष की कमी होती है’ और ‘किसी कमनज़र ईश्वर को ही प्रकाश अपने आप में पूर्ण रूप से सुंदर लग सकता है।’

— मोनिका कुमार

रोबेर्तो ख्वार्रोस │ तस्वीर सौजन्य : estado da arte

वर्टिकल पोइट्री : लास्ट पोएम्ज़

[1]

अभी या बाद में
हमें अपना हाथ आग में डालना पड़ेगा।

लेकिन ऐसा करने से पहले
हाथ लपट बनने का अभ्यास कर सकता है
या शायद लपट को इस बात के लिए मना सकता है
कि वह हाथ के आकार की हो जाए।

अगर दोनों काम असफल हो जाएँ,
तो शायद हाथ और लपट छोटे-छोटे कणों में घुल सकते हैं
भले इन कणों की अपनी ख़ास और अलहदा चमक न हो।

और शायद इस सादगी से
वे ब्रह्मांड को थोड़ा और ताप सकें।

[2]

हाथ की भंगिमा
जब लिखने के लिए उठती है
तो कई बार विचार का सृजन करती है,
विचार से छवि बनती है
वही छवि फिर हाथ को चलाती है।

एक भंगिमा प्रेम जगाती है,
प्रेम उतरोत्तर और भंगिमाएँ जगाता है
और कुछ और भी जो सतह के नीचे रहता है।

भंगिमाओं की स्वतंत्र भाषा
देखने में सोचा-समझा संयोग लगती है
किसी गुप्त प्रतीक्षा को जगाने के लिए
प्रतीक्षा जो हर चीज़ की गहराई में रहा करती है।

पेड़ भी भंगिमाओं की भाषा है
जहाँ संयोग और पेड़ मिलकर जुगत लगाते हैं
ताकि पेड़ से एक पत्ता गिर सके।

[3]

हर इबारत और हर लफ़्ज़
दिन और रात के समय और स्थिति के अनुसार बदल जाते हैं,
पढ़ने वाले की नज़र कितनी साफ़-शफ़्फ़ाफ़ है
मौत के ज्वार कितनी ऊँचाई से आ रहे हैं
इन वजहों से इबारत और लफ़्ज़ का पाठ बदल जाता है।

किसी से मिलने से पहले
और मिलने के बाद
तुम्हारा नाम वही नहीं रह जाता,
यह सोचने से पहले
और दुबारा सोचने पर
कि कल हम नहीं होंगे
मेरा बोला हुआ शब्द वही नहीं रह जाता।

कोई भी चीज़ अलग होती है
जब उसे दिन में देखा जाए
और उसी चीज़ को अगर रात में देखा जाए,
तो वह अलग होती है
लेकिन वे शब्द जिन्हें मनुष्य लिखता है
और वे शब्द जिन्हें ईश्वर नहीं लिखता
वे शब्द और ज़्यादा स्पष्ट हो जाते हैं।
और ऐसा कोई समय नहीं है,
उम्मीद से भरा हुआ समय नहीं
प्रांजल समय नहीं
तटस्थ समय नहीं,
वह क्षण भी नहीं जो किसी की मौत की ख़बर नहीं ले कर आता,
जो हमारे सभी प्रकार के चिंतन और मनन को एक जगह एकाग्र कर दे,
दूरियों को व्यवस्थित कर दे
और उन शब्दों को विवश कर दे
कि वे फिर से वही बन जाएँ जो वे पहले थे
और उनका वही अर्थ हो जाए जो पहले कभी था।

कोई चाहे या न चाहे
हर इबारत बदल सकती है
हर रूप बदल सकता है
जीवन की रहस्यात्मक अस्पष्टता का चमकता हुआ दर्पण भी बदल सकता है
किसी भी चीज़ का स्वरूप हमेशा एक जैसा नहीं रहता।

अनंत भी हमेशा के लिए नहीं है।

[4]

सबसे सुंदर दिन में एक कमी है :
इसके अँधेरे पक्ष की कमी।
किसी कमनज़र ईश्वर को ही
प्रकाश अपने आप में पूर्ण रूप से सुंदर लग सकता है।

जहाँ-जहाँ लिखा हो : ‘‘यहाँ प्रकाश हो’’
वहाँ यह भी कहना चाहिए
‘‘यहाँ अंधकार हो’’
जिस ज़रूरी रात तक हमें पहुँचना है
उस ज़रूरी रात के बीच में आने वाले बिंदुओं को भुला कर
हम उस तक नहीं पहुँच सकते।

[5]

जीने का अर्थ है अतिक्रमण करना।
किसी न किसी क़ानून का अतिक्रमण करना।
कोई विकल्प नहीं है :
किसी चीज़ का अतिक्रमण न करने का अर्थ है मर जाना।

यथार्थ अतिक्रमण है।
अयथार्थ भी अतिक्रमण है।
यथार्थ और अयथार्थ के बीच आईनों की नदी बहती है
जो किसी भी नक़्शे में दिखाई नहीं देती।

उस नदी में सभी क़ानून घुल जाते हैं,
हर अतिक्रमण एक और आईना बन जाता है।

[6]

लॉरा के लिए

एक तीर ब्रह्मांड को बींध देता है।
इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता यह तीर किसने चलाया।
यह तीर ठोस और तरल दोनों के पार हो जाता है।
यह तीर दृश्य और अदृश्य को लाँघ जाता है।
यह पता लगाने की कोशिश करना कि तीर किस दिशा में जा रहा है
इसका मतलब है शून्य के गिर्द दीवार की कल्पना करना।
अज्ञात से अज्ञात तक जाता तीर,
शून्य से आता हुआ तीर जो इसका स्रोत बिंदु नहीं है
शून्य तक जाता हुआ तीर जो इसका गंतव्य नहीं है,
ऐसी गति से जाता हुआ तीर जो गति जैसी नहीं है
लेकिन इसका उन्माद बराबर बना रहता है।

मुझे तुम्हारे हाथ में तीर दिखाई दिया
या तुम्हें मेरे विचार में तीर दिखाई दिया।
मुझे यह तीर बादल को चीरता हुआ दिखाई देता है,
मैं इसे पक्षी के दो टुकड़े करते हुए देख सकता हूँ,
इसे फूलों और बारिश से निकलता हुआ देखता हूँ,
अंधकार को चीरता हुआ तीर,
मैं इसे मृत लोगों में घुसते हुए देखता हूँ।

इस तीर का अचूक और अज्ञात गुण
हमें अपने अज्ञात होने की याद दिलाता है,
ताकि हम भी ख़ुद को अपने आरंभ और अंत से मुक्त कर सकें।

[7]

नामों का थक जाना।

अगर हम अपने प्यारे जंगल में दुबारा जा सकते
जहाँ सब नाम भुलाए जा चुके थे
या कम अज़ कम उस बाग़ के नंगेपन में लौट सकें
जहाँ नामों ने ख़ुद अपना आविष्कार किया था,
निश्चित ही हमें वहाँ प्रतीकों के लिए नई जगह मिल जाएगी।

और अगर संयोगवश हम वहाँ पहुँच गए
जहाँ न कोई वस्तु थी
न वस्तु का नाम था,
तो अनंत को व्यक्त कर देने की जो व्यर्थ थकावट हुई
वह थकावट पिघल जाएगी।
केवल इस जगह पर
हम चीज़ों को उनके नाम के बग़ैर पुकार सकेंगे
बल्कि उन्हें उन भंगिमाओं से पुकारेंगे जो उन चीज़ों से प्रकट होती हैं।

[8]

रंगहीन मछली के शरीर से
छोटे-छोटे ज्ञानयुक्त छिलके गिरते हैं
ये छिलके रात भर बरसते रहते हैं।
ये छिलके हमारी त्वचा से चिपक जाते हैं
और हमें भी अपनी निद्राचारी चमक उधार देते हैं।

लेकिन दुर्भाग्यवश हमारी त्वचा रंगहीन नहीं अपारदर्शी है
और मछलियाँ हमारी पहुँच में नहीं हैं।
रात मछलियों के लिए वह सब बचा लेती है
जो मृत्यु को नहीं प्राप्त होता।

फिर भी ज्ञान के छिलके हम पर बरसते रहते हैं
जैसे कि इन्हें मौन प्राप्त हो गया है
और ये हमारा परिचय ऐसे मौन से कराना चाहते हैं
जो मौन मछलियों के रात्रि मौन से भी बड़ा है।

[9]

वह पल हमेशा आता है
जब तुम्हें मनुष्यों से विराम लेना पड़ेगा
जैसे गुलाब का फूल माली से छुट्टी लेता है
या जैसे बाग़ गुलाब के फूल से छुट्टी लेता है।

जैसे जल जल से विश्राम लेता है
या आकाश आकाश से।

जैसे जूता अपने पाँव से छुट्टी लेता है
या मसीहा अपनी सलीब से।

जैसे सर्जक अपने सृजन से छुट्टी लेता है
या सृजन अपने सर्जक से।

[10]

बंद कमरे में एक अकेला आदमी,
अलविदा कहने की मुद्रा में अपना हाथ ऊपर उठाता है।

दूसरी जगह सुनसान सड़क पर एक अकेला आदमी,
उसी अंदाज़ से अपना हाथ ऊपर उठाता है।

लगभग असंभव संदेह इन दोनों भंगिमाओं को जोड़ता है :
अलविदा कहने का घाव तब खुलता है
जब अलविदा कहने के लिए कुछ नहीं होता
अलविदा कहने के लिए कोई नहीं होता।

लेकिन ये भंगिमाएँ
सही जगह पर मनुष्य की चाबी घुमा देती हैं :
ये भंगिमाएँ पवित्र अलविदा बन जाती हैं।

[11]

हम ज़िंदा होने के कारण मरते हैं।
जितने ज़्यादा ज़िंदा हों, उतने ज़्यादा मरते हैं।
मृत होने की वजह से कोई नहीं मरता।
कुछ लोग, कहीं मरना न पड़े,
इसलिए मृत रहना बेहतर समझते हैं।
इस तरह दो विपरीत कहानियाँ लिखी जाती हैं :
कुछ जीवन-वृत्त लिखे जाते हैं,
असंख्य शोक-संदेश लिखे जाते हैं
लेकिन जीवित होने के विषय में बस थोड़े-से शब्द।

इस तरह ज़िंदगियों और मौतों के बीच
इकहरा दिखने वाला यह संबंध
कई मनमौजी रेखाचित्रों की पच्चीकारी का आँगन बन जाता है।

और उस आँगन में एक खेल रहा है
जो उन रेखाचित्रों की तरफ़ देखता तक नहीं।

[12]

हमने भी जल को धोखा दिया है।

बारिश इस बात के लिए नहीं बनी,
नदी इस कारण नहीं बहती,
पोखर इस बात के लिए नहीं रुका हुआ,
समुद्र इस बात के लिए प्रस्तुत नहीं है।

हम फिर ज़रूरी बात भूल गए हैं,
जल की भाषा के मुक्त स्वर भूल गए हैं,
हम जल की चुपचाप
लेकिन स्पर्शनीय पारदर्शिता भूल गए हैं।
हमने अभी यह तक नहीं जाना
कि पानी की पारदर्शिता कैसे ग्रहण करें।
किसी चीज़ को पीने का अर्थ है उस चीज़ को आत्मसात् करना।

और पारदर्शिता को समझने का अर्थ है
अदृश्य को समझने की शुरुआत करना।

[13]

एक शून्य से दूसरे शून्य तक।
इस तरह हमने जीवन जिया है।
जब हवा के आँचल का बीच वाला हिस्सा हमें स्पर्श करता है
उस स्थिति में साँस लेना और सीधे खड़े रहना आसान होता है,
अनचाहे ही हम शून्य के लिए तरसे हैं।
उस शून्य के लिए जिसने अपनी शून्यता से हमारा पोषण किया है।

एक स्रोत
हमारे अस्तित्व की गहराई से
ऊपर की ओर देखकर विनय करता है
कि जब मृत्यु आए
तो अपना रास्ता न बदले
और हर चीज़ शून्य हो जाए

शायद उस शून्य में हमारे पंख उग आएँगे।

एक शून्य के भीतर एक और शून्य होता है।
इन दो शून्यों में अगर कोई भेद न हो तो इनमें दूरी होती है
हमें सिर्फ़ यह पता करने की ज़रूरत है
और इतने सामर्थ्य की ज़रूरत है
कि उस अंदरूनी शून्य से हम वह दूरी बना सकें।

[14]

नदी को न जानने का अर्थ है तलवार का वार झेलना
और यह मान लेना कि चीज़ें सिर्फ़ अपने सपने देखती हैं
इस बात को नज़रअंदाज़ करना है
कि हमारी नज़र के अलावा एक और नज़र भी है—
दुनिया की गहरी नज़र।

जब हमें उस नज़र के बारे में पता लगता है,
ज़िंदगी ऐसे बदल जाती है जैसे कोई हाथ के दस्ताने को उल्टा कर देता है
दस्ताना उस हाथ को लौटा देता है जिसने इसे पहना हुआ था
आज़ाद हुआ स्पर्श पहली बार चीज़ों को छूता है।

यथार्थ समय की तहों में उलझा हुआ है
इसे हमें ऐसे सुलझाना चाहिए
जैसे हम नाज़ुक कपड़े की तह खोलते हैं
एक हाथ से तह खोलते हैं
तो नीचे एक और हाथ प्रतीक्षा करता हुआ मिलता है।

[15]

अगर कोई विचारों को ऐसे खींच सके
जैसे आसमान के आगे पेड़ की शाख खिंची रहती है,
तो शायद हमारे विचारों पर आराम करने के लिए कोई आ बैठे
जैसे पेड़ की शाख पर पंछी आकर बैठ जाता है।

हम चीज़ों के सत्व को ग़लत समझते हैं
और उसी समझ को अपने साथ ठेलते रहते हैं :
जिस नाज़ुक जाल के अंदर हम रहते हैं
शायद हमें ख़ुद उस नाज़ुक जाल से अधिक ठोस होना चाहिए था।
चूँकि हम उतने ठोस नहीं हैं
सो उस कमी को पूरा करने के लिए
हम आसमान में पेड़ की शाखाओं की तरह
ये आवारा तस्वीरें बनाते रहते हैं।

[16]

उसने हर दिशा में खिड़कियाँ बनाईं।
बहुत ऊँची दीवारों पर,
बहुत नीचे की दीवारों पर,
भुरभुरी दीवारों पर, कोनों पर
उसने हवा पर खिड़कियाँ बनाईं और छत पर भी खिड़कियाँ बनाईं।

उसने खिड़कियाँ ऐसे बनाईं जैसे कोई पंछियों का चित्र बनाता है।
फ़र्श पर, रातों पर,
उसने उस नज़र पर खिड़कियाँ बनाईं जो देखकर भी नहीं देखतीं और सुनकर भी नहीं सुनतीं।
उसने मृत्यु की फिरनी पर खिड़कियाँ बनाईं,
क़ब्रों पर बनाईं,
पेड़ों पर बनाईं।

उसने दरवाज़ों पर भी खिड़कियाँ बनाईं।
पर दरवाज़ा कभी नहीं बनाया।
वह न तो अंदर घुसना चाहता था और न बाहर निकलना चाहता था।
वह जानता था कि यह काम कोई नहीं कर सकता।
वह सिर्फ़ देखना चाहता था : सिर्फ़ देखना।
उसने हर दिशा में खिड़कियाँ बनाईं।
हर जगह खिड़कियाँ बनाईं।

[17]

अपनी कमज़ोरी के कारण मैं बचा रहता हूँ।
अपनी कमज़ोरी के कारण बचा रहता हूँ,
और उन लोगों की कमज़ोरी के कारण बचा रहता हूँ,
जो टूटे हुए पंछियों की तरह भटकते रहते हैं
संसार के गिनती के दिनों में बचा रहता हूँ
जो संसार गिनती करना नहीं जानता।

मेरे लिखने में जो छूट जाता है
वही मेरे लेखन को खोल देता है
और लिखत को ऐसे सहारे की तरफ़ ले जाता है
जो उस सहारे से ज़्यादा भरोसेमंद है
जिस सहारे का मैं इस्तेमाल करता हूँ।

किसी चीज़ को सोचने की नज़ाकत
मेरी सोच में उड़ान भर देती है
और इसे दूसरे उठान तक ले जाती है
जहाँ सोच को तुम्हारे पंख मिल जाते हैं।

सिर्फ़ पहले से टूटी हुई शाखाएँ
खो चुके प्रेम को एकत्र करती हैं
और इन शाखाओं पर उस प्रेम के टुकड़े चिपक जाते हैं
और फिर से पेड़ को बना लेते हैं।

[18]

प्रेम के विरुद्ध प्रेम करना।

यानी जानी-पहचानी क्रूरता में प्रवेश करना
एक की जगह दो करना
लेकिन तीन नहीं करना।
फल से ज़्यादा तने की परवाह करना
और ज़रूरी हो तो गिरे हुए तने पर और इसकी नंगी जड़ पर घोंसला बनाना
फूल के लिए ज़िद करना
लेकिन इसे काटकर चुराने के लिए तैयार न होना
या इसकी गंध पर क़ब्ज़ा करना।

और अगर दो को एक न किया जा सके,
प्रेम के विरुद्ध प्रेम करने की क्रूरता का वही एहसास
शून्य की तरफ़ यात्रा करना,
सिर्फ़ शून्य की ओर चलना।

[19]

मानुअल मैयीआ वायेख़ो और डोरा लूस के लिए

किसी आदमी का घर,
किसी ऐसे आदमी के लिए घर जिसका घर नहीं हो सकता।

किसी आदमी के घर का आँगन,
आँगन जहाँ बारिश अपने आप को गेहूँ की तरह बो रही है।

किसी आदमी के घर का पेड़,
पेड़ जो समय के बीतने का ध्यान रखता है।

किसी आदमी के घर का प्रकाश,
प्रकाश जो रात को अपने जूते खोल देता है

किसी आदमी के घर का दरवाज़ा,
दरवाज़ा जो अब दरवाज़ा नहीं रहना चाहता।
किसी आदमी के घर की छत,
छत जो उसके पैरों के निशान का पीछा करने के लिए पंखों में बँट जाती है।

किसी आदमी के घर की खिड़की,
खिड़की जो उसके चेहरे की परवाह करने के लिए उसका चेहरा अपने ऊपर उकेर लेती है।

किसी आदमी के घर की हवा,
हवा जो उसको अपने अंदर भर लेती है लेती है जब वह इससे साँस लेता है।

किसी आदमी के घर का चित्र,
चित्र जो उसके चित्र की नक़ल करता है।

किसी आदमी के घर का खँडहर,
बस खँडहर ही है जो हारे नहीं हैं।

किसी आदमी के घर की परछाईं,
परछाईं जो आदमी की परछाईं से सुख लेती है।

किसी आदमी के घर का प्रेम
प्रेम जो घर को भर देता है और घर को ख़ाली कर देता है।

[20]

हाँ और न की सड़क के बीच
एक आईना टाँग देना
जो न हाँ का समर्थन करता हो और न नहीं का।

यही आईना हमारी सड़क बन जाएगा,
आईना कई दूसरी छवियों से भर जाएगा
और कई बिंबों को ख़ुद में समा लेगा
और अपनी छवियाँ बनाएगा।

[21]

सैमुअल बैकेट की मृत्यु पर

आरंभ की हकलाहट
अंत की हकलाहट।

जन्मोपरांत मरते चले जाना
उस मृत्यु तक जो अभी तक जी रही है।

बंजर ज़मीन से कुछ शब्द ऐसे खींच लेना
जैसे बेमौक़ा खिले हुए फूल,
फूल जो किसी आरंभ की तरफ़ खुलते तो हैं
लेकिन अपनी सुगंध
किसी अंत की ओर भेज देते हैं।

हर शब्द हकलाहट है।
हर फूल हकलाहट है।
कुछ बड़े पत्थरों के कोष्ठकों के बीच
और दरारों के बीच पड़ा सब कुछ हकलाहट है
दरारों से दौड़ती हुई छिपकलियाँ भी।

इस बात को कोई नहीं कह सकता।
किसी ने इसे बेहतर ढंग से नहीं कहा
कि इस बात को क्यों नहीं कहा जा सकता।

[22]

सभी जवाब ख़त्म हो गए हैं।
शायद जवाब कभी थे ही नहीं
ख़ालीपन के सम्मुख खड़े
ये सिर्फ़ अक्स ही थे।

पर अब तो सवाल भी ख़त्म हो गए हैं।
आईने टूट चुके हैं।
वे आईने भी जिनमें कुछ नहीं दिखाई देता था।
उन्हें ठीक करने की अब कोई युक्ति भी नहीं है।

फिर भी,
कहीं एक सवाल बचा हुआ है।
मौन भी एक सवाल है।

एक आईना बचा रहता है जिसे तोड़ा नहीं जा सकता
क्योंकि यह किसी के सामने नहीं रखा है,
क्योंकि यह हर वस्तु के भीतर पड़ा है।
हमें एक सवाल मिला है।
क्या मौन भी जवाब हो सकता है?

शायद एक निश्चित ऊँचाई पर
सवाल और जवाब बिल्कुल एक जैसे हो जाते हैं।

[23]

हर चीज़ किसी दूसरी जगह शुरू होती है।

इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता
कि कुछ चीज़ें यहीं रह जाती हैं
और यहीं ख़त्म भी हो जाती हैं :
यहाँ कुछ भी शुरू नहीं होता।
इसलिए यह शब्द, यह मौन,
यह मेज़, गुलदान, तुम्हारे पैरों के निशान
सच कहूँ तो यहाँ कभी थे ही नहीं।

हर चीज़ हमेशा कहीं और होती है :
वहाँ जहाँ से यह शुरू होती है।

[24]

हर चीज़ के भीतर शब्दों के टुकड़े हैं—
जैसे ज़मीन में प्राचीन बुआई के बचे हुए अंश।

उन टुकड़ों को ढूँढ़ने के लिए
तुम्हें आरंभ या अंत की हकलाहट को दुबारा ढूँढ़ना होगा।
और नामों के भुलक्कड़पन से फिर उन्हीं शब्दों को लिखने की कला सीखनी होगी,
लेकिन दुबारा शब्दों को लिखने की कला सीखना शब्दातीत होगा।

शायद फिर तुम्हें लगे
तुम्हें उन टुकड़ों को दुबारा जोड़ने की ज़रूरत नहीं है
क्योंकि हर शब्द अपने आप में पूरा संसार है,
किसी भुला दी गई भाषा का शब्द।

यह भी संभव है
तुम हर चीज़ में पूरी इबारत देखने लग जाओ,
निजी और गुप्त इबारत
जिसे समझने के लिए, उसे पढ़ने की ज़रूरत नहीं है।

[25]

एक इबारत लिखना
और इसे पन्ने पर अकेला छोड़ देना।
उस इबारत को दुबारा नहीं पढ़ना,
किसी को नहीं दिखाना,
कहीं नहीं भेजना।
इबारत को पन्ने पर विश्राम करने देना।

और वहीं से यह इबारत अपना पाठक ढूँढ़ लेगी,
जैसे सभी किताबें अपने पाठक ढूँढ़ लेती हैं।

यहाँ तक कि वह किताब भी जो हमारे भीतर लिखी पड़ी है
और हमें यह असंभव लगता है कि इसे कोई पढ़ सकता है।

[26]

हर चीज़ किसी दूसरी चीज़ से बात करती है।

लेकिन रात का आग़ाज़ करने वाले फूल किसके साथ बात करते हैं?

मेरा दिल जो अब मेरा कंधा बन चुका है, किसके साथ बात करता है?

टूटे हुए हाथ की लड़खड़ाहट किससे बात करती है?

मेरी मौत के अगले दिन मेरे शब्द किससे बात करेंगे?

ईश्वर की वही पुरानी अनुपस्थिति किससे बात करती है?

सपनों को तोड़ देने वाले दृश्य किससे संवाद करते हैं?

वह आदमी जो अपनी धुन में मगन अकेला खेल रहा है, किससे बात करता है?

शायद कोई ऐसी चीज़ है जो हर दूसरी चीज़ से बात करती है।
क्या किसी ऐसी चीज़ की कल्पना करना संभव है जो शून्य के साथ संवाद रचती है?

शून्य अगर सभी से विलग हो जाए
तो शून्य का भी अस्तित्व नहीं रहेगा।

[27]

कुछ भी सोचते हुए आज मुझे पीड़ा हो रही है,
जिस हाथ से मैं लिखता हूँ वह मुझे दुःख दे रहा है,
जो शब्द मैंने कल बोले थे, मुझे पीड़ित कर रहे हैं,
और जो शब्द मैंने नहीं कहे थे, मुझे दुःख दे रहे हैं,
यह संसार मुझे दुःख दे रहा है।

कुछ दिनों की तासीर ऐसी होती है
जैसे चीज़ों को ऐसे क्रम में व्यवस्थित कर दो
कि हर चीज़ दुःख देने लगे।

सिर्फ़ एक ईश्वर है जो आज मुझे दुःख नहीं दे रहा।
क्या ऐसा इसलिए है कि ईश्वर है ही नहीं?

[28]

कुछ चीज़ें इतनी जगह घेरती हैं
कि ख़ुद को धकेलते-धकेलते आख़िरकार दूसरी जगह पहुँच जाती हैं
उन विचित्र जीवों की तरह जो अपना मांस ऐसे लटका लेते हैं
कि उस मांस को अपनी देह में फिर से नहीं सोख सकते।
इसी तरह
कई बार कविता मुझे लिखने नहीं देती।
लिखना ऐसे सपाट और दबा पड़ा रहता है
जैसे भारी-भरकम जानवर के नीचे घास दबी रहती है।
ऐसी स्थिति में बस यही संभव है कि घास में ठुँसे पड़े कुछ शब्दों को निकाला जा सके।

लेकिन हर कविता तारों की अनंत हकलाहट के नीचे
एक हकलाहट से ज़्यादा कुछ नहीं।

[29]

नीचे की ओर पतझड़ कहाँ जाता है?
चीज़ों के नीचे यह क्या ढूँढ़ता है?
यह सभी रंगों को नीचे खींच कर फीका कर देता है
जैसे इसे उन चीज़ों को ख़राब करना चाहिए जो डूब रही हैं?

और हम चलते-फिरते पतझड़ की तरह
नीचे की ओर कहाँ धँसते जाते हैं?
पतझड़ ख़त्म हो जाता है, लेकिन हम फिर भी नीचे क्यों धँसते रहते है?
कौन सी ऊबड़-खाबड़ रोशनी है
जो हमारी नींव को खोखला कर देती है
या फिर नींव को मिटा देती है?
या फिर जीवन की नींव नहीं है
क्या सिर्फ़ ख़ालीपन में रोशनी तैरती रहती है?
पतझड़ हमें ऐसी गहराई की तरफ़ खींचता है
जो गहराई है ही नहीं।
गहराई में धँसते हुए
हम ऊँचाई की तरफ़ देखते रहते हैं
जिस ऊँचाई का वजूद गहराई से भी कम है।

[30]

दूर से आते हुए थकान के जाल
कई बार हमारी पहले से बुरी तरह हारी हुई देह की असफलता में जोड़ दिए जाते हैं
विचारों की थका देने वाली हार
और अचानक यह एहसास होना कि हम भी अपराधी हैं
ये सब हमें शून्य की अगल-बग़ल
पीड़ा में लड़खड़ाने के लिए छोड़ देता है।

अगर फिर भी हम नष्ट न हों तो,
शून्य से आती हुई हवा हमें बचा लेती है :
यह हवा इन जालों को तोड़ देती है
और हमारे अपराधी होने के धुँधले एहसास को मिटा देती है।

हमारे लगातार पतन की वजह से
हम अस्थायी रूप से हमेशा पतनशील रहते हैं।

[31]

मैं अपने जीवन के सभी दिनों को जीना चाहा है
लेकिन कुछ दिन मेरे बग़ल से निकल गए,
कुछ दिन मैंने ख़ुद अपनी भटकन में गँवा दिए
और कुछ दिन जीवन ने ख़ुद मुझसे चुरा लिए।

या फिर शायद इन सबके पीछे एक ही कारण है :
यथार्थ हमेशा सोची-समझी डकैती होता है
और लगातार डकैती हो रही हो तो
उसमें कुछ भी नहीं बचता,
ये शब्द और यह मौन भी नहीं।
और यह इच्छा करना भी
कि हम अपने जीवन के सभी दिनों को जिएँ
उन्हीं बहुत सारी भावनाओं की चोरी का हिस्सा है
भावनाएँ जैसे प्रेम करना, मरना और देखना
या सिर्फ़ होना
या किसी को कुछ देना।

चोरी करने वाले चोर या चोरों के गिरोह को खोजना
या ईश्वर पर आरोप लगाना,
यह सब करना भी डकैती करना है।
दुःख की बात यह है कि इस महान डकैती के पीछे किसी का हाथ नहीं है।
कोई ऐसा डकैत नहीं होता जो हमारा सब कुछ चुरा सके।

क्योंकि इस डकैती के पीछे अगर कोई होता
तो उसे इस सबसे पुराने क़ानून का पालन करना पड़ता :
डकैत को डकैती का माल वापिस करना पड़ता है।

पर किसी से कुछ भी वापिस नहीं मिलता।

[32]

सब कुछ खो देना।
एक सपने को खो कर
दूसरा सपना ढूँढ़ लेना :
ऐसा सपना जिसमें सब कुछ चक्कर खा कर घूमता रहता है
ऐसा चक्कर जो इत्तिफ़ाक़ से भी ज्यादा अकस्मात् होता है।

और वह गीत जो ईश्वर भी नहीं गाते,
चाहे जितनी मर्ज़ी कोशिश कर लें,
ईश्वरों के स्वभाव से भी ज़्यादा चंचल गीत,
निर्वासन का गीत।

[33]

धुआँ हमारी छवि है।
हम किसी ऐसी चीज़ का अंश हैं जो जल चुकी है,
हम ऐसी क्षणभंगुरता हैं जिसे देख पाना मुश्किल है,
ऐसी क्षणभंगुरता जो इसी पल में बिखर जाती है
जैसे कोई अधूरा वादा
जिसे कभी पहले किया गया था।

जलावन के ऐसे छल्ले
जो सर्दी की ठंडक को भी ज़रा कम नहीं कर सकते
इस छोटे से गुमनाम द्वीप पर
उन छल्लों को भी धुआँ बन जाना पड़ेगा।

यह छवि हमें कैसे नहीं मोहित करेगी,
इसकी उत्तरोतर असफलता,
इसका मिथ्या पदार्थ,
इसकी बिना चेहरे की लज्जा,
बग़ैर पारे का इसका दर्पण,
सिर्फ़ यही दर्पण असली है।

अगर हमें इस उन्मादी गड़बड़झाले को छोड़ना होता,
तो धुआँ एक और आग पैदा कर देगा।
शायद बग़ैर धुएँ की आग।

[34]

रात कई बार ऐसे ख़त्म होती है
जैसे सामने कोई बड़े पाषाण रख दे
कि हमारे लिए जगह न बचे।
फिर मेरा हाथ तुम्हारा स्पर्श नहीं कर सकता
ताकि हम मृत्यु से बच जाएँ
मैं अपना भी स्पर्श नहीं कर सकता
ताकि हम अनुपस्थित न हो जाएँ।
उसी पाषाण से एक शिरा फूटती है
जो मुझे मेरे विचारों से भी जुदा कर देती है।
इस तरह रात हमारी पहली क़ब्र में बदल जाती है।

[35]

अब मैं सिर्फ़ पुराने जूते पहन सकता हूँ।
जिस रास्ते पर मैं चलता हूँ
वह रास्ता पहले क़दम से ही जूतों की घिसाई शुरू कर देता है।

बस यही पुराने जूते हैं
जो मेरे रास्ते की निंदा नहीं करते
और यही जूते वहाँ पहुँच सकते हैं
जहाँ तक मेरा रास्ता जाता है।

उसके बाद,
तुम्हें नंगे पाँव चलना पड़ेगा।

[36]

हम किसी पवित्र शहर में पहुँच गए हैं।
हम चाहते हैं हमें इस शहर का नाम ना पता चले :
इस तरह हम इसे कोई भी नाम दे सकते हैं।
हमें इस शहर में कोई नहीं मिलता जिससे पूछ सकें
हम इस पवित्र शहर में अकेले क्यों हैं।
हम नहीं जानते यहाँ किन धर्मों की परिपाटियों का पालन किया जाता है।
यहाँ हमें सिर्फ़ यह दिखाई देता है
कि दुनिया के सारे संगीत और समग्र मौन को जोड़ने वाला धागा
एक ही तंतु बन जाता है।

हम नहीं जानते यह शहर हमारी अगवानी कर रहा है या हमें ख़ारिज कर रहा है,
नहीं जानते कि यह कोई स्टॉप है या सड़क यहीं ख़त्म हो जाती है।
हमें किसी ने नहीं बताया यह जंगल या रेगिस्तान क्यों नहीं है।
इस शहर का नाम किसी किताब या नक़्शे में नहीं है।
भूगोलशास्त्र ने इसके देशांतर का ज़िक्र नहीं किया और न ही इसे देखा है।

लेकिन इस पवित्र शहर के केंद्र में एक चौक है
संसार के भीतर का सारा मौन प्रेम
इस चौक में खुल जाता है।
और यह बात हमें अब समझ आती है :
कि इस दुनिया में जो भी पवित्र है
वह दरअसल गुप्त प्रेम है।

मोनिका कुमार (जन्म : 1977) इस सदी में सामने आए हिंदी कविता के प्रमुख हस्ताक्षरों में से एक हैं। उनकी कविताओं की एक किताब ‘आश्चर्यवत्’ शीर्षक से वर्ष 2018 में प्रकाशित हो चुकी है। बतौर अनुवादक भी उन्होंने हिंदी साहित्य को संसार के कुछ अनूठे कवियों से परिचित कराया है। इस प्रस्तुति से पूर्व ‘सदानीरा’ के 19वें अंक के लिए उन्होंने अंतोनियो पोर्चिया के कविता-संग्रह VOICES का हिंदी अनुवाद संभव किया था। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है। यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 21वें अंक में पूर्व-प्रकाशित।

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