जमाल सुरैया की कविताएं ::
तुर्की से अनुवाद : निशांत कौशिक

Cemal Süreya poet
जमाल सुरैया

बीसवीं शताब्दी के मध्य की तुर्की कविता में ‘द्वितीय नववादी’ परंपरा के अगुआ जमाल सुरैया प्रेम-कविता की शानदार परंपरा के अंग रहे. अपने समकालीन कवियों अदीब जानसेवेर, तुर्गुत उयार और सज़ाई काराकोच—जिनके लेखन में शहरी अकेलापन, अजनबीपन जैसे अस्तित्ववादी और उत्तर-आधुनिक प्रतीकों का बाहुल्य रहा—की तुलना में जमाल की कविता में प्रेम एक भिन्न स्वरूप में मौजूद है जो न महान ओस्मानी शाइर फ़ुज़ूली में दिखता है और न ही नाज़िम हिकमत की कविताओं में. जमाल का वास्तविक नाम जमालुद्दीन सबर था. उन्होंने पुर्तगाली कवि फर्नांदो पेसोआ की तरह कई छद्म नामों से कविताएं लिखीं है. अपने कवि मित्र सज़ाई काराकोच से एक शर्त हार जाने पर अपने नाम से एक ‘य’ को हटाकर वह जमाल ‘सुरैय्या’ से जमाल ‘सुरैया’ हो गए. यहां प्रस्तुत सारी कविताएं मूल तुर्की से अनूदित हैं और जमाल सुरैया की प्रतिनिधि कविताओं के संकलन Üstü Kalsın – Yapı Kredi Yayınları, İstanbul से ली गई हैं.

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तुमने अपने पिता को खोया कभी?

तुमने अपने पिता को खोया कभी?
मैंने खोया है एक दफा और मैं अंधा हो गया

उन्होंने पिता के बदन को धोया और कहीं ले गए
मुझे उनसे यह उम्मीद न थी

आप कभी तुर्की हमाम गए हैं?
मैं गया था एक दफा
एक फानूस जल उठा था
मेरी एक आंख उसमें खराब हुई और मैं अंधा हो गया

उन तुर्की हमामों में लगे पत्थर
वे पत्थर आईने के मानिंद साफ थे
मैंने उसमें अपना अक्स देखा
मेरा चेहरा निहायती बदसूरत दिख रहा था
मुझे खुद के चेहरे से यह उम्मीद न थी सो मैं अंधा हो गया

आप कभी आंख में साबुन लग जाने से रोए हैं?

एक रोज

एक रोज छोड़ दूंगा तुम्हें
गोया तम्बाकू छोड़ने जैसी होगी यह कवायद
दिन करीब हैं वे जब तुमसे ऊब रहा हूं मैं
लेकिन यह इस्तांबुल से ऊबने की तरह है शायद

8:10 का जहाज

आवाज में क्या है तुम्हारी, जानती हो?
किसी बाग के बीचोंबीच होने का एहसास
एक रेशमी, नीला ठंड में खिलने वाला फूल
सिगरेट जलाने के लिए ऊपरी तल्ले पर चढ़ रही हो

आवाज में क्या है तुम्हारी, जानती हो?
नींद से कोसों दूर जीती-जागती तुर्की जुबान
अपने काम से नाखुश हो
शहर भी तुम्हें रास नहीं आता
एक आदमी अखबार में तह लगाता है

आवाज में क्या है तुम्हारी, जानती हो?
पुराने चुंबन
गुसलखाने के शीशे पर जमा भाप
जिनसे जमाने बीते तुम मिली नहीं
वे सारे स्कूली गीत

आवाज में क्या है तुम्हारी, जानती हो?
घर के भीतर का बिखराव
अपने दोनों हाथों को सिर के इर्द-गिर्द फेरते हुए
अपनी तन्हाई को संवार रही हो गोया

आवाज में क्या है तुम्हारी, जानती हो?
वे शब्द जो तुमने कहे होंगे
हो सकता है वे बातें कोई बड़ी हैसियत नहीं रखतीं
लेकिन इस वक्त अभी
वे सारी बातें किसी यादगार-सी खड़ी हैं

आवाज में क्या है जानती हो?
वे बातें जो तुम कह नहीं सकीं

मेरी सांस एक सुर्ख परिंदा है

मेरी सांस एक सुर्ख परिंदा है
तुम्हारे सुनहरे बालों के आकाश में
तुम्हें बांहों में भरता हूं
तारीफ-तआरुफ़ से परे तुम्हारे पैर बढ़ते चले जा रहे हैं

जलते हुए रुख्सार को महसूस करते हुए लगता है
मेरी सांस अब एक सुर्ख घोड़े में तब्दील हो चुकी है

हम कि ठहरे मुफलिस, नकदे-शब भी कुछ बाकी नहीं
दम भर के प्यार करो, मुकम्मल रफ्तार में प्यार करो

गर कम भी जिया तो क्या?

मेरे दियासलाई जलाने के दौरान
हर शै सुर्ख थी चेहरे के मानिंद
मेरे दियासलाई जलाने के दौरान
चुनांचे हर शक्ल है मुल्क के मानिंद

मेरे सिगरेट जलाने के दौरान
क्योंकि हर सिगरेट है कलम के मानिंद
मेरे सिगरेट जलाने के दौरान
खिजां के दिन थे गीत के मानिंद

एक कबूतर-सा था मैं मरने के दौरान
अफसुर्दगी से पत्ता-पत्ता गोया
एक कबूतर था मैं मरने के दौरान

तस्वीर

तीन थे जन एक बस स्टॉप पर
आदमी, औरत और बच्चा
जेब में हाथ डाले खड़ा था आदमी
औरत ने थाम रखे थे बच्चे के नन्हे हाथ
आदमी उदास था
उदासी से भरे संगीत की तरह उदास
औरत खूबसूरत थी
खूबसूरत यादों के मानिंद खूबसूरत
बच्चा, खूबसूरत यादों की तरह उदास था
उदास संगीत की मानिंद खूबसूरत

दो दिल

दो दिलों के बीच सबसे छोटी राह :
दो बांहें
एक दूजे की ओर खुली हुईं
और कभी कभी सिर्फ उंगलियों के पोर से छूई जा सकने वाली
दौड़ रहा हूं इर्द-गिर्द सीढ़ियों के
इंतजार की शक्ल अख्तियार कर रहा है वक्त

वक्त से पहले ही हाजिर हूं और तुम मिलती नहीं

किसी रियाज-सा चल रहा है सब कुछ
परिंदे सारे इकट्ठे होकर लौटने की राह में हैं

काश कि महज इसलिए ही चाह सकता तुम्हें

***

[ निशांत कौशिक जामिया मिल्लिया इस्लामिया से तुर्की भाषा में स्नातक हैं. फिलहाल पुणे में एक कंपनी में अस्थायी रूप से कार्यरत हैं. वह भाषा-विज्ञान में गैर अकादमिक पढ़ाई कर रहे हैं और उसमें ही भविष्य ढूंढ़ रहे हैं. उनसे kaushiknishant2@gmail.com पर बात की जा सकती है. यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 19वें अंक में पूर्व-प्रकाशित.]

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