कविताएं ::
शुभम श्री

SHUBHAM SHREE
शुभम श्री

प्याज खाने की तलब

वह भरसक अपने धुले हुए कपड़े पहन कर गया
गोकि शनि बाजार में पुराने मैले कपड़े पहनना बेहतर होता मोल-जोल के लिए

अभिजात्य विद्रूपता को उसी तरह ढक देता है
जैसे गरीबी ईमानदारी को

उसने प्लास्टिक बोरी पर विराजमान प्याज के पहाड़ से
बहुत सतर्क बेपरवाही से दो बड़े प्याज लुढ़काए

लगभग उस कुत्ते के पैरों तक जो एक खूब बड़ा-सा लाल टमाटर खा रहा था

उसका मन हुआ प्याज छोड़ पहले कुत्ते को एक लात मारे और आधा टमाटर बचा ले

धड़कते दिल के साथ वह आगे बढ़ा
मानो झोले में प्याज नहीं बम रखे हों

उसके और प्याज वाले के बीच मसाले, गुब्बारे, जलेबी, हरेक माल दस रुपया के ठेलों जितनी दूरी थी

अचानक सुरक्षित-सा महसूस करता हुआ वह फलों का मुआयना करने लगा
इस इंतजार में कि फल खरीदने वालों को देख सके

कई मिनट बाद उसने एक आखिरी निगाह स्टीकर लगे सेबों पर डाली
मानो वे प्लास्टिक के हों

पूरे रास्ते वह कच्चे प्याज की गंध को सोचता रहा

कभी उसके घर में ईंट पर चौकियां रख कर हर कमरे में प्याज बिछाया जाता था
वह किसी दूसरी ही जिंदगी की बात थी

पागलों के अस्पताल में

पीले सूट वाली औरत को लगता है पड़ोसियों ने उनकी वीडियो बना ली
जो वाट्सएप पर ऑल इंडिया घूम रही है

बुर्के वाली औरत परेशान है पति से जो रोज रात को छत पर चला जाता है
किसी गुप्त प्रेमिका से मिलने

बैसाखी के सहारे खड़े बूढ़े को दौरे पड़ते हैं और वह चीखता है
मुझे मत मारो बेटा

गोल चेहरे वाले सुंदर लड़के को नींद नहीं आती रात भर

लाल फ्रॉक वाली छोटी बच्ची बोलती नहीं कुछ

बींधने वाली आंखों का समंदर है जिनकी लहरें किसी जलती हुई भट्टी से आती मालूम होती हैं

पालतू बिल्ली की मौत से अवसादग्रस्त लोग भी उतने ही परेशान हैं
जितने यूपीएससी के असफल प्रतियोगी

प्रियजनों की निर्मम हत्याओं से जड़ लोग
युद्ध की विभीषिका से बच कर भागे शरणार्थी
अस्पताल के लॉन में सर्दियों की गुनगुनी धूप सेंक रहे गार्ड मरीजों के संबंधियों को पागलपन की दास्तानें सुना रहे हैं
जिन्हें कुत्ते भी बड़ी कौतूहल भरी दिलचस्पी से सुन रहे हैं
जैसे उन्होंने कभी पागल होकर किसी को काटा ही नहीं

और इन सबसे बेखबर कैपेचीनो पी रही
वह नीली आंखों वाली डॉक्टर बर्गर खाती हुई
कई जोड़ी जड़ आंखें चुपचाप उसे देख रहीं
खाते हुए

शादी के बाद

पढ़ लेना
घूम लेना
पहन लेना
उड़ लेना
हमारी जिम्मेदारी नहीं
अच्छा बुरा हमारा नहीं
जैसा वे चाहें
उनकी जिम्मेदारी
एक जिम्मेदारी से दूसरी जिम्मेदारी में तब्दील होते हुए
खूबसूरत सपने थे, प्रेरक कथाएं थीं
टीचरों और डॉक्टरों की, आइएएसों की भी
सर्दियों में परीक्षा देने-दिलाने का सपना
एक कोई सेंटर जहां बाइक की पिछली सीट पर बैठे जाया जाएगा
और एक दिन कोई बहुत प्यार से रिजल्ट लाएगा
बधाई हो तुम पास हुईं फर्स्ट डिवीजन

लेकिन पेट में बच्चा लेकर चालीस रोटियां बेलने का कोई उदाहरण रहा था पहले
यह मालूम नहीं
फेल होकर घर रहने और दिन के दो बजे पोंछा लगाकर नहाने का कोई उदाहरण भी नहीं था
उनके लिए आलू की तरी, मांजी के लिए उबली लौकी, पापाजी के लिए करेले का जूस और बिट्टूजी के लिए परांठे
इनका टिफिन, उनका टिफिन, फिर नाश्ते के बर्तन
फिर दिन का खाना, दिन के बर्तन
फिर शाम का नाश्ता, शाम के बर्तन, शाम की आरती
रात का खाना, रात के बर्तन

इस बीच उठते चाय सोते चाय खड़े खड़े बैठे बैठे चाय चाय
इतनी चाय कि कोई कहे भूकंप आया, भागो
तो सुनाई दे तीन चाय
कहां दबे थे अब तक ये उदाहरण?

मरते हुए इंसान को देखना

उसने तब भी मुझे हैरान अजनबियत से देखा
दया से नहीं कौतूहल से देखा
जितना हो सकता था
निर्मम होकर देखा
जैसे मैं किसी फिल्म का कोई सीन हूं
जो उसकी जागती आंखों के आगे साकार हूं

मैंने अपनेपन की आखिरी उम्मीद खोजी
पर उसके हाथ में कैमरा देखा

मैंने खुद को मर जाने दिया
एक बहुत कोमल याद को याद करते हुए

मैंने खुद को दर्ज हो जाने दिया एक साधारण घटना की तरह
खुद्दारी से मरते हुए

ये भी एक बात थी कि लोग तरसा किए

जैसा मनोज साधारण नाम था, वैसा उसका हुलिया
जाहिर है वह मल्होत्रा हो नहीं सकता था, तो कुमार ही था लाचारी में
उसी लाचारी में सिली हुई शर्ट और प्लेट वाली पैंट पर था वह
जैसे ‘डिंट’ और ‘कांट’ की जगह
‘डिड नॉट’ और ‘कैन नॉट’ पर था

कई साल जिंदगी के डिड नॉट और कैन नॉट तक आने में लग गए उसके
जब सब बंध गए कहीं न कहीं, तब जाकर कतार के आखिरी इंसान-सा काउंटर पर आया वह

सारी खिड़कियां बंद हो चुकी थीं, सारे दरवाजे बंद
फिर भी उसने हिम्मत की
पहले प्रपोजल का पहला शॉक बड़ी दिलेरी से झेला उसने

सिर के बाल उड़ना कोई बीमारी नहीं थी, कोई अपंगता नहीं थी
पर थी वह कुछ तो
कितने शैंपू, कितने कंडीशनर, कितने तेल, कितने तरीके
कुछ बाकी नहीं बचा
सिवाय ठुकराए जाने के
उसने खूब अच्छे कपड़े पहने
खूब तैयार हुआ
खूब मेहनत की
चुपचाप उसने प्यार किया
चुपचाप उदास हुआ
चुप ही रहा वह
अपनी हीनभावना में घुलता
गालियां देता
दुनिया में रंडियां थीं या हरामजादियां
उसकी भाषा में जो थीं सब चूतिया काटने वालीं
गालियां देने के वक्त को क्रेडिट कार्ड से भगाया उसने
जिन्हें चुन सकता था
क्रेडिट कार्ड की बदौलत
सबको चुना
लेकिन जब जब किसी के साथ सोया
रोया ही
चाहता था उसकी जगह उसका वॉलेट रख दिया जाए बिस्तर पर
वह मजबूरियां नहीं चाहता था
समझौते नहीं चाहता था
पर पास वही आते थे
जैसे उसकी पत्नी
जिसे सबसे अंतरंग समय में सबसे प्यार भरी बात यही लगती थी
कि बालों से क्या होता है, तुम बहुत अच्छे लगते हो
प्यार किए जाने के लिए कितना तरसा वह
जितना तरसा उतना भटका
कोई तो दीवाना हो जाए
किसी को तो वह पूरी तरह अच्छा लगे
ये कोई बात न थी
ऐसे सफल आदमी के लिए इस उम्र में जबकि सब उस जैसे ही थे
पर कैसी बात थी
जिसको जिया उसने

डूबती शामों के नीले आसमान के लिए

पहला प्यार

पहला प्यार पहली शराब था
जिसे स्वाद से अनजान पिया मैंने
यही था, यही था
कुछ नहीं था ये तो
सोचा और किया मैंने
डूबकर प्यार
स्वाद अच्छा लगता था
नशा चढ़ता था
चढ़ता जाता था
जैसे चाहा, जितना चाहा
बेपरवाह, खूब खूब किया प्यार
हर मिनट बदल जाने वाले चंचल मन का
पहला कदम था अनुभव की दुनिया में
बड़ी गंभीरता से हर अनुभव जिया मैंने

दूसरा प्यार

दूसरा प्यार दूसरी नौकरी था
तजुर्बों के साये में चलता हुआ
उसे होना नहीं था
लेकिन होने दिया गया
जैसे एक खाली कमरा
जहां किसी को रहना नहीं था
लेकिन रहने दिया गया
रहने भर के लिए
खुशी कम खुशी हुई
हंसी कम हंसी हुई
जो हुआ सब हद में
बेहद कुछ नहीं
प्यार भी नहीं
दूसरी नौकरी संभली हुई नौकरी थी
दूसरा प्यार संभला हुआ प्यार था

तीसरा प्यार

तीसरा प्यार तीसरा रास्ता था
पहले के रास्तों को भुलाने वाला
नई दिशा में ले जाने वाला
तीसरा रास्ता चौकन्नेपन का रास्ता था
दुर्घटना से बचता हुआ
फर्स्ट एड किट लिए
तीसरा प्यार चैट रूम-सा प्यार था
जहां से कभी भी निकला जा सकता था
तीसरा रास्ता मुश्किल रास्ता था
तीसरा प्यार मुश्किल प्यार था

चौथा प्यार

जैसे बरसों का सोया पागलपन जगा हो
एक तूफान आया और प्यार
फिर तूफान आया
तमाम अधलिखी कविताएं फाड़कर
नई कविता शुरू करने के जोश-सा
प्यार आया
जैसे बुखार आया
घर कपड़े जूते पता शहर
सब बदल डालने, सब नया करने
सब भूल जाने, सब खत्म करने
एक जिद्दी-सा खुमार आया

बाद के तमाम प्यार

बाद के तमाम प्यार यानी पांचवे, छठे, सातवें, आठवें और और और…
उम्र की तरह आए
किसी खास वक्त में एहसास कराते हुए
जैसे आईने के सामने चेहरा
या किसी फॉर्म पर डेट ऑफ बर्थ का कॉलम
उन पुराने लोगों की तरह
जिनकी धड़कनें एक वक्त के बाद तेज होना बंद कर देती हैं
सर्दी, गर्मी, भूकंप, तख्तापलट, आंदोलन, अकाल
सब में बराबर रफ्तार से चलती हुई
संवारे हुए बगीचों जैसे आए प्यार
हर चीज करीने से लगी हुई
हर बात करीने से कही हुई
हर मुस्कान का जवाब मुस्कान
हर शुक्रिया का जवाब शुक्रिया
कोई शिकवा नहीं, कोई शुबहा नहीं
कोई जिद नहीं, कोई गुस्सा नहीं
वक्त बेवक्त जिद का अभिनय
गुस्से का भी
करीनेपन के स्वाद के हिसाब से
कैलेंडर की तरह बदलते गए प्यार
प्यार या आईने
जो प्यार की तरह आते गए
फर्क पड़ना कम होता गया
नुकसान होना कम होता गया
जैसे नशा चढ़ना कम होता गया
बहुत-सी शराब के बाद

अपना कमरा

पूरी रात खुद को खुदकुशी से बचाया
एक सपने के साथ जिंदगी से एक भारी रात कम हुई
नया दिन आया बासी आदतों को दुहराने का सबब लिए
नहा-धोकर सोचा मैंने रोज नहाने मुंह धोने का कारण
और खाया बिना सोचे हुए खाने का कारण
ये बिस्तर, ये दीवारें, ये फर्श देखते रहे मुझे चुपचाप
मैंने कमरे को इस तरह छोड़ा जैसे कोई मरा हुआ रिश्ता
जहां कभी वापस न लौटना हो
कमरे से बाहर एक दुनिया में रखा कदम
और सोचा
मैंने खुद को वाकई बचा लिया है
एक पूरा दिन
गले में अटकी हुई रुंध लिए
मैंने तलाशी खुद को खाली करने की जगह
चेहरों, आवाजों और चहलकदमियों के समंदर में
और मैंने खुद को खोया हुआ पाया
जैसे घर के पीछे बहते नाले में मरी बच्ची
वही बिस्तर, फर्श और दीवार देखते रहे मुझे चुपचाप
गले में अटकी हुई रुंध के गलकर बहने तक
फांस टूटने तक
मैंने खुद को बहुत खुशनसीब पाया
बेकमरा लोगों से भरी दुनिया में

***

शुभम श्री की कविताओं की हिंदी में उत्सुकता से प्रतीक्षा की जाती है. वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अपनी पीएचडी अधूरी छोड़कर इन दिनों सूरत में एक कॉरपोरेट नौकरी कर रही हैं. इस सबके बीच वह साहित्य के ‘प्रकट संसार’ से कुछ गुम रहकर पढ़ने और लिखने की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के बीच हैं. उनसे shubhamshree91@gmail.com पर बात की जा सकती है. यहां प्रस्तुत कविताएं ‘सदानीरा’ के 18वें अंक में पूर्व-प्रकाशित.

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