चित्रकथाएँ ::
गार्गी मिश्र

हेड ऑफ़ अ वुमन │ विन्सेंट वॉन गॉग

बहुत सारी चीज़ों से बनता है एक स्त्री का सिर। कभी कभी सोचती हूँ क्या सोचकर वॉन गॉग ने इस कृति का नाम ‘हेड ऑफ अ वुमन’ रखा होगा। क्या एक स्त्री के जीवन का अनुमान उसके सिर से लगाया जा सकता है? बड़ा सिर, छोटा सिर, दाईं या बाईं ओर झुका हुआ सिर, कोई गहरी उभरी चोट लिए हुआ सिर, या फिर भीड़ में फ़ौरन नज़र में आ जाने वाला सिर। यूँ तो देह के हर अंग में जीवन घुला हुआ है। कुछ वक़्त पहले मुझे लोगों के हाथ बहुत विचलित और अचंभित करते थे। अब हाथों से बात सिर पर जा चुकी है। सैकड़ों हाथ हवा में झूलते हैं।

कभी अकेले में होती हूँ तो सोचती हूँ—अपनी माँ के सिर के बारे में। जब वह पाँच वर्ष की रही होगी, तब उसका सिर कैसा दिखता होगा? जब तेरह वर्ष की हुई होगी तब और जब बीस वर्ष की हुई होगी तब? तब कैसा दिखता होगा माँ का सिर जब वह माँ बनी होगी? जब माँ झुककर चलने लगेगी तब और जब माँ नहीं रहेगी तब उसका सिर कैसा दिखेगा?

राह चलते बहुत से सिर नज़र में आते हैं। एक सिर में कई जीवन। एक होंठ, दो आँख, एक नाक, दो कान। एक पुकार, एक मौन, एक प्रतीक्षा, एक अंत, एक अनंत, कोई गंध, कोई गंधहीन उपस्थिति, कोई उच्चारण, कोई कथा। मन होता है किसी रोज़ एक स्वप्न देखूँ। उस स्वप्न को पहले से लिखूँ। स्वप्न में अपना ही सिर खोलूँ और देखूँ उन चीज़ों को जो बिना किसी शोर-शराबे मेरे सिर के अंदर बैठी हैं, और बस बहने लगती हैं—कभी-कभी—एकाएक।

छत के एक कोने में रखी पुरानी टूटी खिड़की मेरे सिर का ही एक हिस्सा है। बारिश में एक हरे पौधे से गिरकर टूटा भीगता पीला सिकुड़ा गला हुआ पत्ता और ठंडे पानी के ग्लास में डूबा चमकता धारदार एक नश्तर भी।

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सॉरो │ विन्सेंट वॉन गॉग

कभी-कभी मन होता है कि शरीर पर धजे सारे कपड़े नोचकर फेंक दूँ। क्या आपके साथ भी ऐसा होता है? मुझे लगता है कि ऐसा हर किसी के साथ होता होगा; और ख़ासकर उनके साथ जिन्होंने अपने दुःखों को अपने शरीर से अलग नहीं समझा है। दुःख और मनुष्य का शरीर स्वभाव से ही नग्न हैं। वॉन गॉग की पेंटिंग ‘सॉरो’ जब भी देखती हूँ, थोड़ी-सी राहत की साँस मिलती है। लगता है कसन कम हुई। एक जकड़न टूटी। ये भारी भरकम लबादे शरीर से छूटे।

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बाय द डेथ बेड │ एडवर्ड मन्च

जीवन के रहते ही आप किसी से नाराज़ हो सकते हैं, अपेक्षाएँ रख सकते हैं, प्रेम कर सकते हैं, उसे दुःख दे सकते हैं। मृत्यु सारी संभावनाएँ ख़त्म कर देती है। जीते जी हम बहुत कुछ समझ नहीं पाते। कितनी अजीब बात है। समझने के लिए एक जीवन कितना छोटा पड़ जाता है। पर जो समझ लेते हैं, उनके लिए मृत्यु के बाद एक नया जीवन शुरू हो जाता है। उनकी समझ उनके जाने के बाद मिसाल बन जाती है। यही सच है।

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हेड ऑफ़ अ वुमन │ विन्सेंट वॉन गॉग

कोई भी बात अकारण नहीं होती। पर हर कारण अपने होने में इतना स्पष्ट है कि मैं उसे उसी तरह देखने में हिचकिचाती हूँ। जीवन ऐसे ही बहुत से कारणों के अकारण से बना है। और इस जीवन से मैं बनी हूँ।

अक्सर कुछ लोग मुझसे पूछ देते हैं कि फलाँ आदमी या औरत तो तुम्हारे बहुत निकट था या थी, तुम्हारी उनसे बात नहीं होती?

कई बार लोग मुझसे मेरे अकारण मुस्कुराने या चुप हो जाने के बारे में पूछ देते हैं। कभी कोई यह पूछ देता है कि सालों से एक ही रंग और आकार की चप्पल क्यूँ पहन रही हो।

इन प्रश्नों के उत्तर मैं नहीं दे पाती और एक नया अकारण मुझे घेर लेता है। बहुत देर तक चुप रहने के बाद दुपहर हो जाती है। कई बार दुपहर का खाना खाते वक़्त मेरी आँखों से पानी गिरने लगता है, ऐसा लगता है कि मानो रोटी में किसी की शक्ल दिखाई दे रही हो या कोई आवारा कुत्ता रोटी की ऊपरी परत हटाकर मुझे ग़ौर से देख रहा हो। उस समय दो रोटी खा पाना मेरे लिए पहाड़ हो जाता है। लेकिन फिर भी मैं तीसरी रोटी लेने रसोई में चुपचाप जाती हूँ और रसोई के आदतन अँधेरे में गुम हो जाती हूँ।

आपने रसोई में पसरे अँधेरे को महसूस किया है? ऐसी जगहों पर पसरे अँधेरे हमारे अकारण को समेट लेते हैं। मुझे लगता है कि ये अकारण हमसे छीन लिए जाएँ तो हम बिल्कुल अकेले हो जाएँगे।

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सोवर │ विन्सेंट वॉन गॉग

मेरे पिता ने बोया, मेरे पिता के पिता ने बोया, मेरे पिता के पिता के पिता ने बोया और इस तरह बीज बोने वालों की नस्लें बढ़ती गईं। मैं क्या बोऊँगी? मुझे नहीं मालूम। मैं अभी बीज तलाश रही हूँ। खेतों में घूम रही हूँ। धूप के थपेड़े और बाढ़ के क़हर देख रही हूँ। सरकार के मुआवज़े देख रही हूँ। पेड़ों से लटकती बीज बोने वालों की काठ हो चुकी टाँगें देख रही हूँ। विन्सेंट भी कुछ बोना चाहता था। उसने बीज ढूँढ़े—बहुत सालों में—एक शताब्दी बीत गई उसके बोए हुए बीज की फ़सल तैयार होने में। और इस फ़सल को वह काट भी नहीं सकता। जो भी बीज की तलाश में निकलेगा उसे बोने के सपने देखेगा, वह अमर हो जाएगा। पर यह समझना होगा कि अमरता के सपने से बीज नहीं मिलेंगे। मरना होगा। बीज बोने होंगे।

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सीन इन्फ़ेनटाइन │ हेनरी जूल्स जीन जेफ़री

मेरे कमरे में दो बिस्तर हैं। एक डबल बेड जिस पर मैं और मेरी छोटी बहन सोते थे। ‘सोते थे’ इसलिए लिख रही हूँ क्योंकि अब वह दूसरे शहर में है, मास्टर्स ऑफ़ सर्जरी की पढ़ाई के लिए। दूसरा बिस्तर घर के पुराने कुछ गद्दों का बना एक चारपाई की ऊँचाई जितना बेड है जिसमें लकड़ी नहीं है। यह शुद्ध रूप से बिस्तर है।

आज मैं, जो अभी तक सोई नहीं हूँ डबल बेड पर पेट के बल लेटी हूँ। आज शाम को ‘दिल से’ फ़िल्म का एक गीत सुना। उस गीत का आग़ाज़ पूरी आत्मा को निचोड़ देता है : पाखी पाखी परदेसी… फिर खिचड़ी खाई, मिनिमलिज्म पर एक डॉक्यूमेंट्री देखी और कुछ बरसों पहले जन्नत को नसीब हो चुके मनोज पटेल के ब्लॉग ‘पढ़ते पढ़ते’ को देखा। फ़ेसबुक की मेमोरी में दिखा रहा है कि आज ही के दिन मनोज एकाएक भीड़ से चले गए थे। जैसे कोई ऊबकर चला जाता हो। हालाँकि उनसे मेरा व्यक्तिगत रूप से परिचय नहीं था, पर मुझे कसक रहती है एक परिचय की।

बड़े बिस्तर पर जब मैं बहुत कुछ याद को अ-याद में बदलने की कोशिश कर रही थी और यह सोच रही थी कि कितना तेज़ी से कुछ-कुछ भूलने लगी हूँ, तब एकाएक मुझे गद्दे वाले बिस्तर जो कि बड़े बिस्तर से कुछ नीचे है, पर एक चूहा दौड़ता हुआ दिखा। बताइए एक साफ़-सुथरी नई धुली हुई चादर जिस पर चूहा दौड़ रहा है। यह दृश्य बहुत विचलित करता रहा। एकाएक अपने अदने से एग्ज़िस्टेंस पर तरस आया और डर भी लगा।

कुछ दिनों बाद अपने शहर से दूर जा रही हूँ रिसर्च के सिलसिले में। पर महसूस कर पा रही हूँ कि यह दूर जाने की ख़बर प्रकृति को कितना पहले हो जाती है। ये हम इंसान जो अपने आपको विकसित कहते हैं, दरअसल जानवरों में थोड़े तर्कशील और अभावग्रस्त जानवर हैं। प्रकृति कितना सहज रूप से जानती है—हर ख़ाली जगह के पूर्ण होने के बारे में। सच बात तो यह है कि आज एक छोटे-से चूहे महाराज ने मुझे यह बता दिया कि बेटा जिस बिस्तर को तुम अपना समझती हो, वह वास्तव में एक ख़ाली स्पेस है। ये पृथ्वी, ये रिश्ते, ये आर्ट, ये डायरियाँ सब कुछ एक ख़ाली स्पेस है।

ख़ैर, चूहे द्वारा मिला इनलाइटनमेंट कल सुबह तक संभव है कि आँत की किसी सतह में दब जाए। मम्मी ने आज सोने के पहले दाल भिगोई है और चावल। लगता है कल संडे को डोसा बनेगा। कुछ दिनों से मुझे राजेश स्वीट्स का रवा डोसा खाने का मन हो रहा था। पता नहीं कैसे मम्मी सूँघ लेती हैं मेरे मन को। मेरे मन में पर और भी कुछ पकता है। मुझे मालूम है कि मम्मी उसे सूँघकर अनसूँघा कर देती है। मुझे हेनरी जूल्स ज्यां जॉफ़री की एक पेंटिंग याद या रही है। उसमें तीन बच्चे हैं। वे तीनों भाई-बहन लगते हैं।

वैसे एक बात और मन में आ रही है सोच रही हूँ कि कह ही दूँ। मुझे सच में अपनी इस जेनेरेशन के अधिकतर लड़के-लड़कियाँ बहुत होशियार लगते हैं। बल्कि होशियार भी नहीं—हुसियार। हुसियार लोग छूट ही जाते हैं मेरे से। ख़ैर हुसियार लोग भाड़ में जाएँ। सुबह हो तो डोसा खाऊँ।

और एक बात और। जैसे-जैसे उम्र बढ़ रही है, वैसे वैसे लगता है कि हम तीन भाई-बहन धीरे-धीरे तीन शहर के बॉर्डर होते जा रहे हैं जो एक दूसरे से सटे तो हैं, पर एक-दूसरे से मिल नहीं पाते।

बस।

अब जल्दी सवेरा हो!

गार्गी मिश्र कविता और कला के संसार से संबद्ध हैं। उनका काम-काज ‘सदानीरा’ पर समय-समय पर शाया होता रहा है, यहाँ देखें :

जैसे गिरती है अंतरिक्ष से कोई मन्नत
मैं एक पत्ती को देखती हूँ और उससे अपनी आस जोड़ लेती हूँ
मेरे शब्दों में मेरा जीवन

 

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